(मधुगीति 260408 A) 21:00
भ्रम रहे कितने भव में,
भ्रमर कितने हैं विचरे;
कितने भँवर हैं प्रकटे,
चिदाकाशी कुहरे!
हर चेहरा रहा युद्ध,
शुद्ध ना अभी हुआ;
प्रकृति की कृति उलझा,
सुलझा सहज ना हुआ!
हर पग पे समर पाया,
ब्रह्म उर में बिन वरे;
अद्वैत झलक बिना लखे,
द्वैत ना गए!
गंतव्य नहीं मिला,
गति है सुगति ना सधी;
प्रगति कहाँ है हुई,
प्रणति प्रभु से ना हुई!
बिन भाव महत खोये,
जीव कृष्ण न पाये;
‘मधु’ गोपी बने ब्रज प्रवास,
विश्व सुहाये!
-डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
भ्रम रहे कितने भव में!
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