भारतीय संस्कृति में आदिकाल से विवाह के अनेक प्रचलन हैं जिसमें सबसे अच्छी विवाह पद्धति अपनी जाति में विवाह करना है। अपने ही गोत्र से, भाई-बहन के बच्चों के साथ विवाह नहीं करना चाहिए। अन्य जाति अथवा धर्म संप्रदाय में विवाह नहीं करना भी उचित माना गया है। अन्य जाति या धर्म संप्रदाय में विवाह नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से समाज उसे सम्मानजनक ढंग से स्वीकार नहीं करता और उनके बच्चे को भी समाज सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति के अनुसार अपनी ही सामाजिक रीति अनुसार अपनी ही जाति में अपने रिश्ते-नातो के साथ सहमति से अन्य गोत्र में विवाह करने की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। आधुनिकता की आड़ में मनमाना आचरण करने वाले लोग अन्य समाज, जाति, संप्रदाय, धर्म अथवा अपने ही गोत्र में समाज के सहमति के बिना भी संबंध कायम करते हैं जो सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से अमान्य है। हाल ही में इसी आशय का आदेश छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा भी पारित किया गया है। हमारा यही आप सभी से अनुरोध है कि अंतरजातिय विवाह संबंध ना करें, अपनी जाति व समाज में ही अपने गोत्र को छोड़कर अन्य गोत्र से विवाह करें और स्वस्थ, सुखी, सम्मानित जीवन यापन करने का प्रयास करें।
-नारायण प्रसाद पाली
वरिष्ठ नागरिक साहित्यकार
गडरिया समाज छत्तीसगढ़
मो. 9575761235
सगोत्र विवाह संबंध पूर्णत: प्रतिबंधित होना चाहिए!
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