(मधुगीति 260510 F) 22:55
जो भी रही थी व्याधि देह,
विकृति बोधि की;
स्मृति के बंधनों की,
विधा भाव लोक की!
कर्त्तव्य जो भी किए,
प्रतिक्रियाएँ वे किए;
जिनको थे कष्ट दिए,
बेधे चित से वे किए!
है यंत्र यह शरीर,
तंतु नाड़ियों से युत;
चक्रों से तरंगित रहा है,
भूमा झंकृत!
है प्रभावित हर उर लहर से,
हृदय हमारा;
सृष्टि का हर ही सृष्ट,
बना सुर है हमारा!
जब ध्यान मिलते गुरु चरण में,
सौंप सुषुम्ना;
तन मन की व्यथा होती नि:सृत,
‘मधु’ के प्रभु मिलत!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
जो भी रही थी व्याधि देह!
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