सन 1911 में बना पाल समाज संगठन उत्तर प्रदेश के बड़े औद्योगिक शहर कानपुर में स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद पाल के सपनों से आज यहां तक पहुंचा है। आज वह समय चलते अनेक प्रकार के संगठनों का निर्माण कर चुका है। आज ना तो कहने के लिए उसके पास संगठनों की कमी है और ना ही अखिल भारतीय राष्ट्रीय अध्यक्षों की कमी है। बस कमी है यदि तो सर्वमान्य एक राष्ट्रीय कार्यकारिणी की। मैं अपने उन अनेक पूर्वजों का बहुत-बहुत आभारी हूँ जिन्होंने अखिल भारतीय पाल महासभा बनाकर इस गडरिया जाति को एक स्वाभिमानयुक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी थी। लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात आया। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में चुनाव प्रणाली के चलते आज वोट की कीमत पहचानी जा रही है। नेता और वोटर दोनों में खेल चल रहा है और इसी खेल में धर्म, पंथ, मजहब की भिन्न-भिन्न विचारधाराओं से निकले भिन्न-भिन्न नायकों ने राजनीतिक दल अपनी-अपनी विचारधारा से बनाए। यह सही है कि समय में बदलाव को कोई रोक नहीं पाया है। मैं बहुधा कहा करता हूँ और देखा भी है, आम जनसामान्य लोगों के जीवन के साथ जब जिया तो पता चला कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं। यह मुहावरा सनातन सच है। वैसे सनातन सच पर मंथन इस देश की अद्भुत खोज है। आज सनातन की बात पर दिल्ली में सरकार चल रही है, लेकिन जीवन जीने में जो आयाम दिखते हैं उनमें क्या है सनातन? बड़ा सवाल है। सनातन जो होता आया है, चलता आया है और चलता रहेगा, सनातन है। जैसे जीवन-मरण, सुख-दुख, लोभ-मोह, उत्थान-पतन, यश-अपयश, हानि-लाभ, यह छह सनातन युग्म हैं। लेकिन राजनेताओं और समाज की समस्याओं की चिंता करने वालों ने आज एक वैचारिक उन्माद समाज में ला दिया है। शिक्षित होना और सही शिक्षित होना, दोनों में बड़ा फर्क है। देश के बड़े नायकों ने अपने तरीके से समाज की समस्याओं के समाधान में योगदान दिया है। हम भी अपनी लेखनी से उनके बहुत कर्जदार हैं। लेकिन हम जटिल भारतीय सामाजिक संरचना में गडरिया पाल बघेल समाज जो आपकी व्यवस्था में ओबीसी में आता है, के दर्जनों संगठन बने हैं कि मैं ओबीसी का भला कर रहा हूँ। सामाजिक आत्मसम्मान में ओबीसी समाज को तथाकथित सवर्ण समाज ने पीछे किया है। इस कूटनीति के तहत हाथी के दांत खाने और दिखाने के अलग-अलग हैं। आज देश में पिछड़ों में सामाजिक आत्मसम्मान की लड़ाई जोरों पर है। वर्तमान सरकार का नारी वंदन अधिनियम-2023 और देश की जनगणना के बीच सामाजिक संतुलन की बहसें चल पड़ी हैं और इन बहसों में वैचारिक विज्ञापन किए जा रहे हैं। यह दौर बड़ा क्रांतिकारी साबित होगा, जहां सत्ता से बाहर लोग सत्ता में आने के लिए वोटर को लोक लुभावन नारे ही नहीं रुपये-पैसे, चीजें देकर अपने पक्ष में कर रहे हैं। नए-नए विचार गढ़े जा रहे हैं। ऐसे में मुझे अपने समाज के तमाम नायकों से कहना है कि जोश में होश रखो, इस देश में रह रहे हो तो वैचारिक विज्ञापनों से बचो। देश के लोगों, पिछड़े समाज के लोगों के बीच मिलजुल करके वर्तमान समय को पकड़ो। अपने व पिछड़ों के महत्व प्रदर्शन के लिए अपनी मूल जाति गडरिया लिखो और ओबीसी आरक्षण भारत सरकार आनुपातिक रूप से दुगना करें, इस पर मिल-जुलकर काम करो। अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए भिन्न-भिन्न मंचों के बजाए एक मंच पर आने के साथ दबाव बनाओ और चले आ रहे पुराने सिस्टम को बदल डालो। यह मौका हाथ से न जाने दो, तब तुम सब देखोगे नए भारत को, स्वाभिमान और आत्मसम्मान से जीने वाले नए भारतीय समाज को। पिछड़े समाज को तभी सही न्याय मिल पाएगा।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
परास्नातक जनसंचार
मो. 9794866822
जोश में होश रखो, वैचारिक विज्ञापनों से बचो!
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