विभिन्न प्रकार के पंथ, संप्रदाय और संस्कृतियों का प्रश्रयदाता, सनातन धर्म आज स्वयं की छांव में पुष्पित, पल्लवित, पंथ, संप्रदाय, संस्कृतियों पर अपनी छाप छोड़ने में असफल तो है ही वरन आश्रित पंथ, संप्रदाय और संस्कृतियों की ‘धिक्कारने योग्य परंपराओं का अब स्वयं ही अनुसरण करने लगा है!’ हम सनातनी राखी के कच्चे धागे से बंधे रिश्ते और मुँहबोले रिश्तों को भी आजीवन निभाते हैं, इन पर अपनी निष्ठा भी समर्पित करते हैं। खाप-पंचायतों के मकड़जाल में जकड़ा, ग्रामीण अंचलों में निवासरत, सभ्य सनातन कबिलाई समाज के कतिपय ठेकेदार आज रिश्तों की पवित्रता की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर शेष नहीं छोड़ रहे हैं। मामा-मामी, चाचा-चाची, बुआ-फूफा, मौसा-मौसी के बच्चे जिन्हें आपस में भाई-बहन ही माना जाता रहा है, इनसे डांड़ वसूली कर इन्हें भी पति-पत्नी स्वीकार कर इनके वैवाहिक आयोजनों में प्रीतिभोज खा के उंगलियां चाट रहे हैं। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उड़ीसा के सभ्य सनातन कबीलाई समाजों में यह आम बात है। हिंदू विवाह अधिनियम में सपिंड और निषिद्ध संबंधों की व्याख्या है जिसे छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 5 मई 2026 को एक केस के फैसले में स्पष्ट किया है कि सगे भाई-बहन के बच्चे भी आपस में भाई-बहन ही होते हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी सभ्य समाज की प्रथा संविधान से बड़ी नहीं हो सकती। ऐसे विवाह को शून्य घोषित कर दिया है। लेकिन सभ्य समाज के कबिलाई ठेकेदार जो अपने-आप को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के ताऊ से कम नहीं समझते। ये लोग भाई-बहनों के बच्चों के प्रेम संबंध को न सिर्फ स्वीकार कर रहे हैं, बल्कि डांड़ वसूली भी कर रहे हैं। यानि दूध भी दूहो और और चारा भी खाओ। सभ्य समाज में अपना ठेका चलाते हुए, यह संदेश भी देते हैं कि दूर राज्यों में निवासरत बिरादरी में विवाह न करो, भले ही आपस में भाई-बहन का विवाह ही क्यों न करना पड़े। नई पीढ़ी की संतानें दो कदम आगे हैं जो सगोत्रीय होकर भी स्वयं को सपिंड नहीं मानती और भाई-बहन के सगोत्रीय बच्चे ही आपस में प्रेम-प्रसंग चला रहे हैं और सभ्य समाज के संचालकों को सामाजिक भोज के साथ पचास हजार देकर सामाजिक मान्यता भी पा रहे हैं। 19वीं सदी की शुरुआत से 1950 तक के पुरखे अत्यंत सम्माननीय थे, एक से बढ़कर एक क्रांतिकारी नेता एवं समाज-सुधारक हुए। किंतु 1950 के बाद के अंग्रेज जिन्हें स्वतंत्रता भी कौड़ियों के जैसे मिली है, अपने सनातनी रिश्तों की पवित्रता को भी संभाल नहीं पा रहे हैं, न अपनी ही संतानों को सपिंड रिश्तों का महत्व ही समझा पा रहे हैं। 20वीं सदी के जातक न विज्ञान को समझ पा रहे हैं, न ही इस अवधारणा को समझ पा रहे हैं कि सगोत्रीय रिश्तों को विवाह हेतु निषिद्ध संबंध क्यों माना गया है। खाप-पंचायत के संचालकों के अधीन गूंगी-बहरी बनकर बैठी भीड़ न कुछ सुन पा रही है, न कुछ बोल पा रही है, न ही कुछ समझ पा रही है। ‘सबके मुंह को डांड़ के भोज का स्वाद भा रहा है और समाज में डांड़ से वसूले गए पैसे की उगाही में एक अलग ही नशा छा रहा है।’ जैसा खाओ अन्न वैसा पाओ मन। अमर्यादित रिश्तों से वसूले धन का अन्न खाओगे, अमर्यादित आचरण और रिश्तों के समर्थक बन जाओगे। खाप-पंचायतों के अधीन सभ्य कबीलाई समाज और इसके संचालकगण, ‘एक पंथ जो मामा-मामी, चाचा-चाची, बुआ-फूफा, मौसा-मौसी और भी कई संवेदनशील रिश्तों की भी पवित्रता और मर्यादा नहीं समझता, उन्हीं का अनुसरण करता दिख रहा है।’ सभ्य सनातन कबीलाई समाज के संचालकों से बड़ी विनम्रतापूर्वक निवेदन है कि आप ऐसा समाज न बनाएं जो रिश्तों को कलंकित करे। वर्ना नई पीढ़ी कहां तक गिरेगी, कल्पना तो कर ही सकते हैं। घृणित गुनाह भी माफ एक डांड़ के बदले। गोत्रों की हिलें बुनियाद एक डांड़ के बदले।
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985
रिश्तों को रौंदता सभ्य सनातन कबीलाई समाज!
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