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लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की विचारधारा के उत्तराधिकारी बनें!

वर्तमान में देश-विदेश में गडरिया समाज की एक आस्था, पहचान, संबल, प्रेरणा, जो भी कहें वह मातोश्री पुण्यश्लोक लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर हैं। कुछ समय पहले लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा स्थापना का प्रचलन प्रारंभ हुआ जो आज ग्रामीण अंचल तक पहुंच चुका है। आस्था इतनी प्रबल है कि वर्तमान में हजारों की संख्या नहीं बल्कि लाखों की संख्या में देश-विदेश में उनकी प्रतिमाएं स्थापित हो चुकी हैं और हो रही हैं। अनुमान है कि आने वाले समय में तीव्र गति से इनकी संख्या में वृद्धि होगी। आस्था उत्सव और सामाजिक सम्मेलन आवश्यक हैं। इनसे समाज में चेतना का विस्तार होता है, सद्भावना का जागरण होता है, एक-दूसरे से लोग परिचित होते हैं, संगठित होते हैं और संघर्ष के लिए संकल्पबद्ध होते हैं। वर्तमान में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की 301वीं जयंती जब हम मनाने जा रहे हैं तब हम थोड़ा आगे बढ़कर सोच-समझ रखते हुए काम करने का प्रयास करें, संकल्प लें। लोकमाता अहिल्याबाई होलकर को हम सब लोग श्रद्धापूर्वक माता के रूप में सम्मान देते हैं और उनके छायाचित्र व प्रतिमा का पूजन करते हैं। किंतु इतने मात्र से माता के प्रति हमारी जिम्मेवारी पूरी नहीं हो पाती, इसके लिए हमें लोकमाता की विरासत का वास्तविक उत्तराधिकारी बनने का प्रयास करना होगा, पुरुषार्थ करना होगा। लोकमाता की वास्तविक विरासत उनकी विचारधारा है, उनका सेवा कार्य है, उनका संघर्ष है, उनका त्याग और तपस्या है। आओ हम सब मिलकर उनके विचारों के उत्तराधिकारी बनने का 301वीं जयंती पर संकल्प लें और माता के सेवा कार्यों को, सुशासन व्यवस्था को, नारी शिक्षा, नारी संगठन, पर्यावरण सुधार हेतु पौधारोपण, पौधों का संरक्षण, पूर्वजों की स्मृति में बाग-बगीचे का निर्माण, वाटिका का निर्माण, जहां-जहां उनका मंदिर या प्रतिमा है वहां सेवा कार्यों के लिए सेवा केंद्र का संचालन किया जाए। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे कुटीर उद्योग, भेड़पालन, गोपालन, कंबल उत्पादन एवं विक्रय केंद्र के रूप में संचालित करने का समाज संकल्प ले, समाज के गरीब बच्चों की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करने का संकल्प ले। फिजूलखर्ची रोकने के लिए मृतकभोज एवं कर्ज लेकर आधुनिक रूप से दिखावे के रूप में किए जाने वाले शादी-ब्याह पर रोक लगाई जाए। सामूहिक विवाहों को प्रोत्साहन दें तथा मृतक का अंतिम संस्कार सामान्य रूप में किया जाए। यदि हम अपने बच्चों को लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के आदर्श चरित्र का दिग्दर्शन कराएं, उनके बताए मार्ग पर चलें, नशामुक्त परिवार बनाएं तो हम उनके वैचारिक उत्तराधिकारी बनने के करीब पहुंच सकते हैं। शासन-प्रशासन, विधानसभा, संसद, पंचायत में हमारे लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो, इसके लिए हमें संवैधानिक आश्रय लेना चाहिए। समाज के लोगों को राजनीति के माध्यम से अपने हक और अधिकार के लिए संघर्ष करने का बीड़ा उठाना चाहिए, तभी हम उनके वैचारिक उत्तराधिकारी बनने का सौभाग्य प्राप्त करने में समर्थ हो सकेंगे। इन्हीं शब्दों के साथ लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जयंती की राष्ट्र के सभी भाई-बहनों को बधाई व शुभकामनाएं।
-नारायण प्रसाद पाली
वरिष्ठ नागरिक साहित्यकार
गडरिया समाज छत्तीसगढ़
मो. 9575761235

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