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सुयोग्य पत्नी, कुशल प्रशासिका और धर्मपरायण नारी थीं अहिल्याबाई होलकर!

प्रात:स्मरणीय पुण्यश्लोक मातोश्री देवी अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई सन 1725 ई. को औरंगाबाद जिले के चौंडी गांव के पटेल मणकोजी शिंदे के घर हुआ था, जोकि जाति से धनगर थे। वे एक धर्मपरायण व्यक्ति थे। आगे चलकर उनका प्रभाव देवी अहिल्याबाई पर पड़ा। अच्छे संस्कारों के कारण वह आगे चलकर एक सुयोग्य पत्नी, कुशल प्रशासिका और धर्मपरायण सिद्ध हुर्इं। इसी कारण लोग उन्हें श्रद्धा से माता, देवी व सती कहते थे। उनकी तुलना सीता व सावित्री से करते थे। उनके राज्य की सीमाएं हिंदू धर्म की चौकियां कहलाती थीं। उनका युग मालवा का सतयुग कहलाता था। सन 1735 ई. में उनका विवाह युवराज खण्डेराव से हुआ और बाद में उनके दो बच्चे हुए। खण्डेराव ने पलवल, फरीदाबाद, थुन, हथीन, जोरू, होडल, मथुरा, नन्दगांव, बरसाना पर अपनी वीरता व कौशल से अपना अधिकार किया। 17 मार्च 1754 ई. को उनके पति युवराज खण्डेराव होलकर वीरगति को प्राप्त हुए जिससे उन्हें अल्पायु में ही वैधव्य देखना पड़ा। देवी अहिल्याबाई होलकर ने सती होने की इच्छा जाहिर की थी, लेकिन उनके ससुर श्रीमंत मल्हार राव होलकर ने उन्हें सती नहीं होने दिया। श्रीमंत मल्हार राव होलकर की 20 मई 1766 ई. को मृत्यु के बाद उनके पौत्र देवी अहिल्याबाई होलकर के पुत्र मालेराव होलकर राज सिंहासन पर बैठे। जिस समय देवी अहिल्याबाई होलकर ने शासन का कार्यभार संभाला था, उस समय राज्य की स्थिति बड़ी खराब थी। चारों और लूटपाट, राहजनी, डकैती का बोलबाला था। आए दिन उनको शिकायतें मिलती रहती थीं। ऐसे समय में उन्होंने एक ऐसा साहस व बुद्धिमता का निर्णय लिया जो भारतीय इतिहास में अनोखा था। उन्होंने भरे दरबार में घोषणा की कि जो वीर राज्य की जनता को चोर-डाकुओं से छुटकारा दिलाएगा, मैं उससे अपनी पुत्री मुक्ता का विवाह करूंगी। दरबार में सन्नाटा छा गया, तभी एक धनगर युवक यशवंत राव फणसे उठा और उसने यह कार्य पूरा करने का बीड़ा उठाया। उसने थोड़े ही दिनों में चोर-डाकुओं से राज्य की जनता को मुक्ति दिलाकर शांति स्थापित कर दी। देवी अहिल्याबाई होलकर ने अपने वचन के अनुसार यशवंतराव फणसे के साथ अपनी पुत्री मुक्ताबाई का विवाह बड़ी धूमधाम से कर दिया और दहेज में तराना का परगना भी दिया। अहिल्याबाई के पुत्र मालेराव की 27 मार्च 1767 ई. को मृत्यु हो गई जिससे देवी अहिल्याबाई होलकर को बहुत दुख हुआ। देवी अहिल्याबाई ने धार्मिक दृष्टि से महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया। जिस समय उन्होंने राज्य सिंहासन सम्भाला उस समय खजाने में 16 करोड़ रुपये थे। आसपास के लालची लोगों ने होलकर राज सिंहासन को हथियाने के षड्यंत्र शुरू कर दिए। देवी अहिल्याबाई होलकर ने राज्य सिंहासन की बागडोर अपने हाथों में लेकर घोषणा कर दी कि होलकर राज सिंहासन की वह स्वामिनी हैं, वह उसकी स्वयं देखरेख करेंगी। पूना के पेशवा के भाई रघुनाथराव ने होलकर राज सिंहासन को हड़पना चाहा और वह 50 हजार की सेना लेकर महेश्वर पर चढ़ गया, लेकिन देवी अहिल्याबाई होलकर ने स्त्रियों की सेना उससे लड़ने को तैयार कर ली और उन्होंने घोषणा कर दी कि कोई यह न समझे कि मैं एक विधवा स्त्री हूँ, मेरे पूर्वजों ने तलवार के बल पर राज कायम किया है, यदि किसी ने होलकर राज्य की ओर कुदृष्टि डाली तो मैं तलवार की नोक से उसकी आंखें फोड़ डालूंगी। राघोबा का पौरुष पानी मांग उठा और वह तुरंत लज्जित होकर वापस चला गया। कहते हैं कि देवी अहिल्याबाई होलकर के राज्य पर आक्रमण करने के लिए राघोबा के सैनिकों ने साफ इनकार कर दिया था। उनके राज्य पर रामपुरा के चंद्रावत राजपूत ने हमला किया जोकि उदयपुर घराने का व्यक्ति था। देवी अहिल्याबाई ने 31 गाँव देकर उससे समझौता कर लिया। उन्होंने देवी अहिल्याबाई होलकर की उदारता को कायरता समझा और 1771 ई. में पुन: चढ़ाई कर दी। तब देवी अहिल्याबाई होलकर ने अपनी सूझबूझ व साहस से राजपूतों को पराजित किया। राजपूतों ने सन 1783 ई. में भी विद्रोह किया लेकिन देवी अहिल्याबाई होलकर ने उसे भी दबा दिया। 1787 ई. में राजपूतों ने पूरी तैयारी के साथ पुन: होलकर राज्य पर आक्रमण किया। अबकी बार देवी अहिल्याबाई होलकर कुपित हो उठीं और उन्होंने राजपूतों पर आक्रमण कर उन्हें करारी मात दी। राजपूतों के नेता सौभाग सिंह चंद्रावत को तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया। चंद्रावतों की कमर हमेशा-हमेशा के लिए तोड़ डाली। जो राजपूत राजा उसके ससुर मल्हार राव होलकर के समय उनके अधीन चौथ (कर) चुकाते थे, देवी अहिल्याबाई होलकर की वीरता के आगे वह सारे विद्रोही राजपूत राजा अपने आप उनकी शरण में आ गए। होलकर राज्य में भील लोग अक्सर चोरी-डकैती, राहजनी किया करते थे। देवी अहिल्याबाई होलकर ने उनके मुखियाओं को बुलाकर उन्हें बुरा काम छोड़ने के लिए कहा लेकिन भीलों ने फिर भी बुरे काम यथावत चालू रखे। देवी अहिल्याबाई होलकर ने भीलों के सरदारों को पकड़कर उनमें से कईयों के सिर कलम करवा दिए। बाकी भील अपने आप उनकी शरण में आ गए। बाद में देवी अहिल्याबाई होलकर ने भीलों को आर्थिक सहायता दी। उन्हें खेतीबाड़ी, उद्योग-धंधे एवं राजकीय सेवाओं में भी रखा, जिससे राज्य में लूटपाट बंद हो गई और लोग निर्भय होकर विचरने लगे तथा चारों और शांति का माहौल हो गया। देवी अहिल्याबाई होलकर नित्य नए-नए धार्मिक कार्य करती थीं। उन्होंने हजारों मंदिरों, कुओं, बावडियों, धर्मशालाओं का निर्माण करवाया। उन्होंने प्रमुख तीर्थों हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, काशी, प्रयाग, अयोध्या, मथुरा, पुष्कर, शुक्रताल, उज्जैन, इंदौर और महेश्वर इत्यादि में अनेक मंदिर, धर्मशालाएं व सदावत स्थापित किए। उन्होंने 7 पुरी, 4 धाम, 12 ज्योतिर्लिंग व 43 धर्मतीर्थों को अनुदान भी दिया। उन्होंने 12,673 मंदिर, धर्मशालाओं, घाटों, कुओं, बावडियों का निर्माण कर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया। वे शिवरात्रि के अवसर पर प्रतिवर्ष गंगाजल बंटवाती थीं, पक्षियों के लिए खेत मोल लेकर चुगने के लिए छोडती थीं, भेड़-बकरी, गाय-भैंस, बैल आदि के लिए चारे का प्रबंध करती थीं। उन्होंने जानवरों के पानी पीने के लिए जलकुंड बनवाए, यहां तक कि चीटियों व मछलियों के लिए भी खाने का प्रबंध किया। देवी अहिल्याबाई होलकर कहती थीं कि मेरा कुछ नहीं है, जिसका है मैं उसी के पास भेजती हूँ। वे प्रजाहित के सभी कार्य किया करती थीं, प्रतिदिन गरीबों को भोजन करवाती थीं, इसलिए मालवा में एक कहावत उनके बारे में मशहूर थी-धरती मालव गहरे गंभीर, मग-मग रोटी पग-पग नीर। उन्होंने घरेलू उद्योग-धंधों को प्रोत्साहन दिया, हजारों बेरोजगार बुनकरों को महेश्वर में लाकर उन्हें बसाया। 30 वर्ष राज्य करके 70 वर्ष की आयु में उन्हें आभास हो गया कि अब उनका अंतिम समय आ गया है। उस दिन उन्होंने दान-धर्म किया, सारी धार्मिक विधियां पूरी करके महेश्वर के किले में शिव चरणों में बैठ समाधि लगाकर उन्होंने अपने नश्वर शरीर को छोड़ दिया और धर्म शक्ति में 13 अगस्त 1795 को हमेशा-हमेशा के लिए लीन हो गईं। कहते है उनकी याद में उनकी श्यामा नामक गाय ने भी खाना-पीना छोड़ दिया था।
संकलित : गडरिया अशोक पाल, गाजियाबाद
संस्थापक अध्यक्ष स्वाभिमान शिक्षा संस्कृति समाजोत्थान न्यास
मो. 9717420311

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