भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो परिवारों का पवित्र बंधन माना जाता है। विवाह हमारे संस्कारों, परम्पराओं और सामाजिक मूल्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन वर्तमान समय में शादियां अपनी मूल भावना से दूर होती जा रही हैं। आज विवाह समारोह सामाजिक प्रतिष्ठा, दिखावा और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप शादियों में अनावश्यक खर्च, प्रदूषण, अश्लीलता, दहेज और आर्थिक बर्बादी तेजी से बढ़ रही है। यह स्थिति समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
दिखावे की होड़ और आर्थिक बोझ
आजकल शादियों में अत्यधिक खर्च करना एक फैशन बन गया है। महंगे बैंक्वेट हॉल, लाखों रुपये की सजावट, डीजे, बैंड-बाजा, आतिशबाजी, महंगे कपड़े और सैकड़ों प्रकार के भोजन केवल दिखावे के लिए किए जाते हैं। समाज में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने मध्यम एवं निम्न वर्ग के परिवारों की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। कई परिवार अपनी हैसियत से अधिक खर्च करते हैं और कर्ज लेकर शादियां करते हैं। परिणामस्वरूप वे वर्षों तक आर्थिक संकट और मानसिक तनाव झेलते रहते हैं। अनेक गरीब परिवार बेटियों की शादी के कारण कर्ज में डूब जाते हैं और जीवनभर उससे उबर नहीं पाते। यह प्रवृत्ति सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देती है।
रात में शादियां : समस्याओं का कारण
प्रकृति ने हमें दिन में सूर्य का प्रकाश दिया है, फिर भी अधिकांश शादियां रात में आयोजित की जाती हैं। रात में होने वाली शादियों में अत्यधिक बिजली की खपत होती है, जिससे ऊर्जा की बर्बादी होती है। हजारों लाइटों और सजावट में खर्च किया गया धन समाज के लिए किसी उपयोगी कार्य में लगाया जा सकता है। रात्रिकालीन विवाहों के दौरान महिलाओं और लड़कियों के साथ अभद्रता, छेड़छाड़ तथा अपराधों की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। देर रात तक चलने वाले कार्यक्रम सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से भी उचित नहीं हैं। यदि शादियां दिन में सादगीपूर्ण ढंग से आयोजित हों तो समय, धन और ऊर्जा तीनों की बचत हो सकती है।
ध्वनि प्रदूषण और पर्यावरण पर प्रभाव
आजकल विवाह समारोहों में डीजे, तेज आवाज वाले स्पीकर और बैंड-बाजों का अत्यधिक उपयोग किया जाता है। तेज ध्वनि से ध्वनि प्रदूषण फैलता है, जिससे बुजुर्गों, बच्चों, विद्यार्थियों और बीमार लोगों को अत्यधिक परेशानी होती है। कई बार रातभर तेज आवाज में संगीत बजने से आसपास के लोग सो भी नहीं पाते। इसके अतिरिक्त आतिशबाजी और अत्यधिक बिजली के उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण भी बढ़ता है। विवाह समारोहों में उत्पन्न प्लास्टिक और भोजन का कचरा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। हमें समझना होगा कि सामाजिक उत्सवों का आयोजन पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
भोजन में अपव्यय और स्वास्थ्य समस्याएं
वर्तमान में विवाह समारोहों में भोजन के नाम पर अत्यधिक दिखावा किया जाता है। दर्जनों प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं, जिनमें से बड़ी मात्रा में भोजन बर्बाद हो जाता है। कई बार भोजन में रासायनिक रंग, मिलावटी मसाले और अस्वास्थ्यकर सामग्री का उपयोग किया जाता है, जिससे लोगों के बीमार होने की घटनाएं भी सामने आती हैं। भारतीय संस्कृति सादा और सात्विक भोजन की शिक्षा देती है। यदि विवाह समारोहों में सादा, पौष्टिक और सीमित भोजन रखा जाए तो स्वास्थ्य और आर्थिक दोनों दृष्टियों से लाभ होगा।
दहेज प्रथा : समाज की सबसे बड़ी बुराई
शादियों में बढ़ते खर्च और दिखावे का सबसे बड़ा कारण दहेज प्रथा भी है। दहेज के कारण अनेक परिवार आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। प्रतिदिन दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और आत्महत्या जैसी घटनाएं समाज को शर्मसार करती हैं। विवाह एक पवित्र संस्कार है, इसे लेन-देन और व्यापार का रूप नहीं दिया जाना चाहिए। जब तक समाज स्वयं आगे बढ़कर सादगीपूर्ण विवाह और दहेज मुक्त विवाह को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
सामाजिक सुधार की आवश्यकता
आज समय की मांग है कि समाज में सादगीपूर्ण विवाह को बढ़ावा दिया जाए। निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं-
दिन में विवाह समारोह आयोजित किए जाएं। डीजे, तेज ध्वनि और अनावश्यक रोशनी पर नियंत्रण हो। सादा एवं पौष्टिक भोजन को प्राथमिकता दी जाए। दहेज प्रथा का पूर्ण बहिष्कार किया जाए। सामूहिक विवाहों को प्रोत्साहित किया जाए। विवाह में फिजूलखर्ची के बजाय शिक्षा और समाज सेवा पर ध्यान दिया जाए। समाज के प्रतिष्ठित लोग स्वयं सादगीपूर्ण विवाह कर उदाहरण प्रस्तुत करें।
निष्कर्ष
विवाह जीवन का महत्वपूर्ण संस्कार है, इसे दिखावे और बर्बादी का माध्यम नहीं बनाना चाहिए। यदि समाज समय रहते नहीं जागा, तो आने वाली पीढ़ियां भी इसी गलत परम्परा का शिकार होती रहेंगी। सादगीपूर्ण विवाह न केवल आर्थिक बोझ को कम करेंगे बल्कि समाज में समानता, नैतिकता और सामाजिक सौहार्द को भी मजबूत करेंगे। हमें यह समझना होगा कि विवाह का उद्देश्य सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाना नहीं, बल्कि दो परिवारों को प्रेम, सम्मान और संस्कारों के बंधन में जोड़ना है। इसलिए अब समय आ गया है कि समाज पुरानी रूढ़िवादी और दिखावटी परम्पराओं पर अंकुश लगाए और सादगीपूर्ण, संस्कारयुक्त तथा पर्यावरण अनुकूल विवाह व्यवस्था को अपनाए।
-प्रवेन्द्र धनगर, जिलाध्यक्ष, अलीगढ़
धनगर समाज उत्थान समिति, उत्तर प्रदेश
मो. 7024712793
शादियों में बढ़ती बर्बादी : सामाजिक सुधार की आवश्यकता!
अति उत्तम।
समाज सुधार जरूरी है।