जवानी में हमारे भी बड़े रंग थे,
‘तनख़्वाह’ नाम की एक हसीना के संग थे।
महीने की पहली तारीख को वो मुस्कुराती थी,
और तीसरी तक आते-आते ‘अलविदा’ कह जाती थी!
कभी दोस्तों के साथ घूमने में चली जाती,
कभी ईएमआई के संग भाग जाती,
हम ढूंढते रह जाते जेब के कोनों में,
और वो ‘खर्चों’ के संग इठलाती!
फिर एक दिन जिंदगी ने करवट ली,
बालों ने भी सफेदी की साजिश की,
घुटनों ने भी कहना शुरू किया-
‘भाई साहब, अब आराम कीजिए जरा जी!’
तभी एक नई नायिका ने एंट्री मारी,
ना मेकअप, ना नखरे—सीधी-सादी प्यारी।
नाम था उसका—‘पेंशन’,
और अंदाज था पूरा ‘लाइफटाइम कनेक्शन’!
अब ये हर महीने टाइम पे आती है,
ना बहाना बनाती, ना रूठ के जाती है।
चुपचाप बैंक में आकर बैठ जाती है,
और एसएमएस करके दिल बहलाती है!
‘प्रिय ग्राहक, आपकी पेंशन आ गई है…’
बस ये मैसेज सुनकर दिल गा उठता है!
शाम की चाय के साथ जब बैठते हैं,
ये कान में धीरे से कहती है—
‘घबराइए मत हीरो,
पिक्चर अभी बाकी है… ‘मैं यहीं हूँ!’
हाँ, एक शर्त जरूर लगाती है ये,
साल में एक बार परीक्षा लेती है ये—
‘जीवन प्रमाण पत्र’ का फॉर्म भरवाती है,
और प्यार से पूछती है—
‘बताइए…अभी जिंदा हैं?’
हम भी सीना तान के कहते हैं—
‘अरे भई! टाइगर अभी जिंदा है!’
और सुनिए…असली मोहब्बत तो ये है,
अगर हम भी कभी चुपके से निकल जाएँ,
तो ये हमारी अर्धांगिनी का हाथ थाम लेती है,
उसे बिना झुके जीना सिखा देती है।
ना कोई शिकवा, ना कोई शिकायत,
बस चुपचाप निभाती है हर जिम्मेदारी की इबादत।
तो दोस्तों…
मोहब्बत बहुत देखी होगी आपने,
पर ऐसी वफादारी कम ही मिलती है।
जहाँ तनख़्वाह ने साथ छोड़ा,
वहाँ पेंशन ने उम्रभर साथ निभाया है।
एलआईसी की पेंशन…
जिंदगी के साथ भी जिंदगी के बाद भी!
प्रस्तुति : श्याम शंकर पाल उर्फ सचिन
हरिकमल दर्पण हरियाणा प्रभारी
पाल एकता मंच राष्ट्रीय सचिव
भारतीय जीवन बीमा निगम
सीनियर इंश्योरेंस एडवाइजर
मो. 9891441417, 9999007349
पेंशन-ऐ-हसीना…!
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