आस्था मनुष्य के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह उसे कठिन समय में उम्मीद देती है, मानसिक सहारा देती है और कई बार अच्छे कर्मों की प्रेरणा भी बनती है। इसलिए किसी की धार्मिक आस्था पर सवाल उठाना इस लेख का उद्देश्य नहीं है। लेकिन बदलते समय के साथ धार्मिक आस्था के बदलते स्वरूप को देखकर एक सवाल जरूर उठता है—क्या हमारी आस्था हमेशा हमारे अपने विश्वास और समझ से बनती है, या कई बार फिल्म, प्रचार, सोशल मीडिया और चमत्कार की उम्मीद उसे एक नई दिशा दे देते हैं? यह सवाल किसी देवी-देवता, संत या धार्मिक स्थान को लेकर नहीं, बल्कि उस मानसिक प्रक्रिया को समझने के लिए है जिसके माध्यम से आम लोग किसी धार्मिक ट्रेंड का हिस्सा बन जाते हैं। अपने आसपास और बीते समय को देखें तो यह बदलाव साफ दिखाई देता है। एक समय संतोषी माता की फिल्म लोकप्रिय हुई। उसके बाद बड़ी संख्या में लोगों के बीच संतोषी माता के व्रत और पूजा-पद्धति की चर्चा बढ़ी। फिर साईं बाबा से जुड़ी फिल्में, धारावाहिक और कथाएँ लोकप्रिय हुईं और अनेक स्थानों पर साईं मंदिर बनने लगे। इसके बाद अलग-अलग समय में लड्डू गोपाल और खाटू श्याम जैसे धार्मिक स्वरूपों के प्रति लोगों की रुचि और लोकप्रियता तेजी से बढ़ती दिखाई दी। आज कैंची धाम और नीम करौली बाबा के प्रति बढ़ती रुचि भी इसी बदलते धार्मिक परिदृश्य को समझने का एक उदाहरण है। फिल्मों, सोशल मीडिया और लोकप्रिय चर्चाओं के कारण किसी धार्मिक व्यक्तित्व या स्थान की चर्चा बहुत तेजी से लोगों तक पहुँच सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आस्था गलत है। सवाल यह है कि किसी धार्मिक व्यक्तित्व के प्रति लोगों की रुचि अचानक इतनी तेजी से क्यों बढ़ जाती है? यहीं से हमें अपने भीतर झाँकना होगा। असली आकर्षण कहीं चमत्कार की उम्मीद तो नहीं? मनुष्य के भीतर इच्छाएँ और उम्मीदें छिपी होती हैं। किसी को बीमारी से छुटकारा चाहिए, किसी को नौकरी, किसी को व्यापार में सफलता, किसी को संतान की इच्छा, किसी को पारिवारिक समस्या का समाधान तो किसी को आर्थिक परेशानी से मुक्ति चाहिए। यानी हर व्यक्ति के भीतर कोई न कोई लालसा, अभिलाषा या मनोकामना हो सकती है। जब किसी धार्मिक व्यक्तित्व या स्थान के बारे में ऐसी कथाएँ सुनाई जाती हैं कि वहाँ जाने से मनोकामना पूरी हुई, किसी की समस्या दूर हुई या कोई चमत्कार हुआ, तो हमारे भीतर पहले से मौजूद उम्मीद उस कहानी से जुड़ जाती है। यहीं चमत्कार की उम्मीद हमारी आस्था को आकर्षित करने लगती है। हो सकता है कि कहीं न कहीं हमारे मन में यह उम्मीद भी हो कि शायद मेरी भी कोई इच्छा पूरी हो जाए। मनोकामना रखना गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब मनोकामना की पूर्ति की उम्मीद ही हमारी आस्था का मुख्य आधार बन जाए। फिल्म दिखाती है, प्रचार दोहराता है और ट्रेंड बन जाता है। आज किसी धार्मिक विषय को लोकप्रिय बनाने की ताकत पहले से कहीं ज्यादा है। फिल्म में कोई धार्मिक कथा दिखाई गई। सोशल मीडिया ने उसे आगे बढ़ाया। किसी ने अपना अनुभव बताया। किसी ने चमत्कार की कहानी सुनाई। फिर उसी विषय के सैकड़ों वीडियो हमारे सामने आने लगे। एक वीडियो देखा, दूसरा आया। दूसरा देखा, तीसरा आया। कुछ समय बाद हमें लगने लगता है कि हर कोई उसी के बारे में बात कर रहा है। यहीं ट्रेंड अपना काम शुरू करता है। ट्रेंड आपको एक मशीन की तरह चलाने लगता है और उसका रिमोट धीरे-धीरे ट्रेंड के हाथ में चला जाता है। आपको लगता है कि आप अपनी इच्छा से आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन आपकी इच्छा को लगातार एक ही दिशा में धकेलने वाली सामग्री आपके सामने रखी जा रही होती है और पता ही नहीं चलता कि कब हमने अपने विवेक को खूंटी पर टांग दिया और भीड़ का हिस्सा बन गए। किसी चीज को लाखों लोग पसंद करने लगें तो वह लोकप्रिय जरूर हो जाती है, लेकिन केवल लोकप्रिय हो जाने से वह सत्य नहीं हो जाती। यह बात धर्म के साथ-साथ जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है। सोशल मीडिया पर वायरल होना सत्य का प्रमाण नहीं है। किसी के हजारों अनुभव सुनना वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है और किसी स्थान पर लाखों लोगों का पहुँचना भी किसी दावे के सच होने का प्रमाण नहीं है। इसलिए जब किसी धार्मिक कथा या चमत्कार की बात हमारे सामने आए तो श्रद्धा रखने के साथ-साथ सवाल पूछने की क्षमता भी बची रहनी चाहिए। जहाँ आस्था है, वहाँ बाजार भी पहुँचता है। जब किसी धार्मिक स्थान या धार्मिक प्रवृत्ति से बड़ी संख्या में लोग जुड़ते हैं, तो उसके आसपास आर्थिक गतिविधियाँ भी बढ़ती हैं—होटल, भोजन, प्रसाद, पूजा सामग्री, धार्मिक वस्तुएँ, यात्रा और आॅनलाइन प्रचार आदि। यह कहना उचित नहीं होगा कि हर धार्मिक गतिविधि के पीछे व्यापारिक उद्देश्य होता है। लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि जहाँ बड़ी संख्या में लोगों की भावनाएँ और आर्थिक गतिविधियाँ जुड़ती हैं, वहाँ बाजार की ताकतें भी सक्रिय हो सकती हैं। इसलिए किसी धार्मिक ट्रेंड को समझने के लिए केवल आस्था को देखना पर्याप्त नहीं है। हमें यह भी देखना चाहिए कि उसमें फिल्म, सोशल मीडिया, प्रचार, हमारी मनोकामना और बाजार—इन सबकी भूमिका कितनी है। क्या हमारी आस्था भी ट्रेंड के साथ बदल रही है? यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। अगर आज एक धार्मिक स्वरूप लोकप्रिय है और कुछ वर्षों बाद कोई दूसरा धार्मिक स्वरूप लोकप्रिय हो जाता है, तो क्या हमारी श्रद्धा भी उसी दिशा में चली जाती है? अगर ऐसा है तो हमें यह सोचने की जरूरत है कि हम धर्म को समझ रहे हैं या धर्म के लोकप्रिय स्वरूपों का अनुसरण कर रहे हैं। नई पीढ़ी का धार्मिक अभिव्यक्ति का तरीका बदलना गलत नहीं है। सोशल मीडिया के माध्यम से धार्मिक जानकारी प्राप्त करना भी गलत नहीं है। लेकिन समस्या तब है जब ट्रेंड हमारी सोच का स्थान ले ले। नई आस्था रखना समस्या नहीं है। आस्था का आधार केवल ट्रेंड बन जाना समस्या है। धर्म हमें करुणा, सेवा, संयम, सत्य और मानवता की सीख दे सकता है। किसी संत या धार्मिक परंपरा से प्रेरणा लेकर यदि कोई व्यक्ति बेहतर इंसान बनता है तो यह आस्था का सकारात्मक पक्ष है। लेकिन जहाँ किसी घटना के कारण, प्रमाण और प्रक्रिया को समझना हो, वहाँ विज्ञान और विवेक का स्थान कोई विश्वास नहीं ले सकता और यहीं हमें चमत्कार के सवाल पर वापस आना चाहिए। चमत्कार के पीछे क्या है? विज्ञान का मूल सिद्धांत है कि घटनाएँ कारणों और परिस्थितियों के साथ घटित होती हैं। जिस घटना के कारण हमें दिखाई नहीं देते या जिन कारणों को हम समझ नहीं पाते, वह हमें चमत्कार जैसी लग सकती है। एक जादूगर भी हमारे सामने ऐसा दृश्य प्रस्तुत करता है जिसे देखकर हमें कुछ क्षण के लिए चमत्कार जैसा अनुभव होता है। लेकिन उसके पीछे कोई तरकीब, तकनीक, मनोविज्ञान या भौतिक सिद्धांत काम कर रहा होता है। जादूगर उस रहस्य को छिपाकर हमारे मनोरंजन को लक्ष्य करता है। धार्मिक संदर्भ में जब किसी घटना को चमत्कार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब भी हमें उसके पीछे के कारणों और परिस्थितियों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। फर्क इतना है कि जादूगर आपकी आँखों और मनोरंजन को लक्ष्य करता है, जबकि चमत्कार का धार्मिक प्रचार आपकी आस्था और उम्मीद को लक्ष्य कर सकता है और शायद यही वह बिंदु है जहाँ हमें सबसे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। चमत्कार की उम्मीद हमारी छिपी हुई लालसा को छू सकती है। प्रचार उस उम्मीद को मजबूत कर सकता है। ट्रेंड उसे भीड़ तक पहुँचा सकता है और बाजार उस भीड़ के आसपास अपना स्थान बना सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण चीज है—हमारा विवेक। आस्था रखिए, लेकिन विवेक के साथ। विश्वास रखिए, लेकिन प्रश्न पूछने की क्षमता के साथ और चमत्कार की उम्मीद से पहले उसके पीछे छिपे कारण को समझने की कोशिश कीजिए, क्योंकि विज्ञान चमत्कार को नकारने के लिए नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे कारण को खोजने के लिए प्रश्न पूछता है और शायद यही प्रश्न पूछने की आदत ही हमें ट्रेंड की भीड़ से अलग करके एक विवेकशील इंसान बनाती है।
-रणपाल सिंह, मेरठ
मो. 8881119008
क्या हमारी आस्था भी ट्रेंड के साथ बदल रही है?
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