(मधुगीति 261007 C) 16:07
जितना उठोगे देह से,
जितना तरोगे मोह से;
उतना ही हल्का होओगे,
जा व्योम ज्यादा लखोगे!
एक दिन है जग को छोड़ना,
जा दूर सबको देखना;
तो आज से ही क्यों न जा,
वह दृश्य अद्भुत देखना!
जितनी जगत की वेदना,
संवेदना संयोजना;
है चेतना की ज्योत्सना,
उसके बदलते रहे ना!
भव रोग भोग वियोग जो,
हैं चित्त के पैदा किए;
उद्वेग औ संघर्ष जग,
हैं अहं के जाये हुए!
दो डूबा उनको महत में,
छू लो चरण शिव व्योम में;
‘मधु’ प्रभु धरा पे पाओगे,
हर प्रहर अमृत छकोगे!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
जितना उठोगे देह से!
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