हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था का लचीला होना धीरे-धीरे घातक होता जा रहा है। जहां आम व्यक्ति को न्याय समय से नहीं मिल पाना न्यायिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है वहीं दूसरी ओर सत्ता में बैठे लोग इसका पूरा लाभ ले रहे हैं। इससे आम आदमी और देश के युवाओं का भी न्यायिक व्यवस्था से विश्वास धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। हम न्यायपालिका से अपेक्षा रखते हैं कि देश में उन विवादों को जल्दी निपटाने की कोशिश करें जिसमें देश का भविष्य और उसके साथ युवाओं का भविष्य जुड़ा हो। देश का भविष्य शैक्षिक व्यवस्थाओं पर निर्भर होता है, उसे भी सालों तक न्यायपालिका न्याय नहीं दे पाती है, जिसका जीता-जागता उदाहरण 69 हजार शिक्षक भर्ती का मामला है जिसमें देश का युवा कीड़े-मकोड़े की तरह न्याय की उम्मीद आज भी लगाए हुए है। उसका कहीं न कहीं भरोसा न्यायपालिका के प्रति कमजोर होता जा रहा है, जो फिर से सरकार के पास आशा लेकर पहुंचा है। इसमें देश के साथ-साथ युवाओं के भविष्य को बर्बाद करने का पूर्ण दायित्व न्यायपालिका पर जाता है जिसमें उसे समय से न्याय नहीं मिल पाता है। आज दुनिया में शैक्षिक व्यवस्थाओं पर बड़े लेबल पर काम हुआ है, जहां बड़े से बड़े पाठ्यक्रम कम से कम फीस और बिना न्यायिक प्रक्रिया में उलझे साफ-सुथरी व्यवस्था में स्थापित करने से युवाओं और देश दोनों का विकास हुआ है। हमारे देश में न्यायिक व्यवस्था में उलझी शिक्षक भर्ती देश और देश के युवाओं दोनों को निरंतर कमजोर कर रही है। इन सबकी जिम्मेदार न्यायपालिका है जिसके चलते आज हमारे देश में मेडिकल और टेक्निकल शिक्षा की फीस दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वहीं विदेशों में इन्हीं पाठ्यक्रमों की फीस कम होती जा रही है। ऐसा क्या है कि जो हम नहीं कर पा रहे हैं और वह लोग कर रहे हैं। जहां हमारे देश में एमबीबीएस की फीस करोड़ो में है वहीं विदेशों में यह 5 से 10 लाख में हो जाती है। इन सबमें कहीं न कहीं हमारे देश की संवैधानिक कमजोरी है, सत्ता में बैठे लोगों में विल पावर की कमी और देश की न्यायपालिका की कमजोरी है। एक छोटी से छोटी प्राइमरी भर्ती को सालों साल तक न्याय न मिल पाना बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है। अब जरूरत है न्यायपालिका में बड़े सुधार की जो स्वयं न्यायपालिका को करना होगा। अन्यथा एक दिन लोगों का भरोसा समाप्त होते ही न्यायपालिका का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा जिसका फायदा सत्ताधारी लोग लेंगे, वे तानाशाही को स्थापित कर देंगे। दुनिया का भारत इकलौता देश है जहां न्याय समय से नहीं मिलता है। जब कोई व्यक्ति सालों साल जेल में रहकर बाहर आता है, फिर पता चलता है कि वह निर्दोष है तो उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता है। जिस देश के युवाओं और निर्दोष लोगों के साथ न्यायिक व्यवस्था द्वारा ही अन्याय होता हो वह न्याय लेने कहां जाए? अपराधियों को खड़े-खड़े जमानत दे दी जाती हो और गरीब आदमी को छोटे से छोटे केस में जमानत नहीं मिलती हो तो जाहिर सी बात है कि कहीं न कहीं न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठता है। यह व्यवस्था न्यायपालिका को ही सुधारनी होगी। हजारों करोड़ के बैंक बकायेदारों को गिरफ्तार नहीं किया जाता है, 10 हजार रुपये बैंक लोन वाले को जेल भेज दिया जाता है। यह सब विश्लेषण क्या न्यायपालिका की जिम्मेदारी नहीं है? न्यायपालिका का न्याय आम आदमी को मिलना चाहिए, उसकी जगह अमीर आदमी को न्याय मिलता है, गरीब को नहीं। यह कैसी न्यायिक व्यवस्था है, जिसे बदलना आवश्यक है, इससे पहले कि न्यायपालिका की इस कमजोरी का लाभ लेकर राजनैतिक लोग पूरी व्यवस्था को ही बदल दें। यह मेरा संदेश केवल व्यवस्था बदलने को लेकर है, किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मेरा उद्देश्य नहीं है। अगर किसी को ठेस पहुंचे तो मैं पूर्व में ही माफी मांगता हूँ। न्यायपालिका को लोगों को अपील करने का एक सरल उपाय भी करना चाहिए, आज लोग न्यायपालिका में न्याय पाने को बड़ा संघर्ष मानते हैं जहां वकीलों की फीस देना मुश्किल होता है आम आदमी को और ऊपर से न्याय में देरी। तो लोग ऐसी स्थिति में न्यायपालिका से बाहर ही समझौता कर संतोष कर लेते हैं। यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य है हमारे देश की न्यायपालिका के लिए।
-डॉ. सुधीर पाल
स्वाभिमान महासभा उत्तर प्रदेश भारत
मो. 9005566201
भारतीय न्यायिक व्यवस्था में न्याय के प्रति एक महत्वपूर्ण विश्लेषण!
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