मेरठ। उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में पाल समाज निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नजर आ रहा है। इसीलिए पाल समाज को अपने पाले में करने के लिए सभी राजनीतिक दल जोर-आजमाइश कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में देश के एक सबसे बड़े मीडिया ग्रुप के न्यूज पोर्टल पर भी विस्तृत लेख प्रकाशित हुआ है जो पाल समाज के राजनीति में बढ़ते दबदबे का सबसे बड़ा प्रमाण है। इस लेख के अनुसार यूपी में पाल समाज किसी एक दल के साथ नहीं है, बल्कि अलग-अलग सीट पर वोटिंग पैटर्न अलग-अलग नजर आता है। उत्तर प्रदेश में पाल समाज को आमतौर पर पाल, बघेल, धनगर और गड़रिया समुदाय के रूप में जाना जाता है। यूपी में पाल-बघेल-धनगर-गड़रिया समाज ओबीसी वर्ग के भीतर एक बहुत बड़ा और निर्णायक मतदाता समूह है। पाल समाज अतिपिछड़ी जातियों में आता है, जिसे गड़रिया और बघेल जातियों के नाम से जाना जाता है। ब्रज और रुहेलखंड के जिलों में पाल समुदाय काफी अहम माना जाता है। कानपुर देहात, इटावा, प्रयागराज, औरैया, जालौन, ललितपुर, झांसी, महोबा, मीरजापुर, अलीगढ़, हाथरस, आगरा, कन्नौज, फरुर्खाबाद, बदायूं, बरेली और मुरादाबाद जैसे जिलों में इस समाज के मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। पाल वोटर अवध के फतेहपुर, रायबरेली और प्रतापगढ़ तमाम जिलों में 15 से 25 हजार की संख्या में रहते हैं, लेकिन विधानसभा सीटों पर उनकी संख्या 5 से 10 हजार है। इसके बावजूद यह काफी अहम वोटबैंक माने जाते हैं। पाल समाज सूबे की करीब 35 से 40 विधानसभा सीटों पर सीधा निर्णायक असर रखता है। वह भले ही खुद जीत न सके, पर हार-जीत तय करने की ताकत रखता है। यूपी में पाल समाज के छह विधायक हैं। सपा के टिकट पर 2022 में दो विधायक चुने गए थे, जिसमें समर पाल सिंह अमरोहा के नौगांवा सादात से जीते थे और पूजा पाल कौशांबी जिले की चायल सीट से विधायक बनी थीं। पूजा पाल ने बाद में सियासी पाला बदलकर बीजेपी खेमे का दामन थाम लिया है। बीजेपी से 2022 में अजीत सिंह पाल कानपुर देहात की सिकंदरा सीट से चुने गए और छर्रा सीट से रावेंद्र पाल सिंह जीते थे। प्रेमपाल धनगर फिरोजाबाद की टूंडला सीट से बीजेपी विधायक हैं। ऐसे ही उपचुनाव में आरएलडी के टिकट पर मिथिलेश पाल विधायक चुनी गईं। इसके अलावा स्थानीय निकाय चुनावों और जिला पंचायतों में पाल समाज का मजबूत दखल है। अजीत पाल यूपी की योगी सरकार में स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री हैं, जबकि मोदी सरकार में एस.पी. सिंह बघेल केंद्रीय मंत्री हैं, जो आगरा से लोकसभा सांसद चुने गए थे। यूपी के पाल समुदाय से वह इकलौते लोकसभा सांसद हैं और अब बीजेपी ने प्रकाश पाल को राज्यसभा सांसद बनाया है, जो पार्टी के ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष रहे हैं। उत्तर प्रदेश में पाल समुदाय कभी किसी एक दल के साथ नहीं रहा। शुरूआती दौर में यह कांग्रेस का परंपरागत वोटर रहा, लेकिन बसपा के उदय के बाद हाथी पर सवार हो गया। बसपा का गठन 1984 में कांशीराम ने किया था और 1995 में भागवत पाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। उसके बाद 1997 में दयाराम पाल ने पार्टी की कमान संभाली थी। अब 24 साल के बाद विश्वनाथ पाल को पार्टी की कमान मिली है और उनके कंधों पर ओबीसी समुदाय को जोड़ने का जिम्मा भी मायावती ने डाल दिया है। प्रयागराज से विधायक रहे राजू पाल को राजनीति में मायावती ने एंट्री कराई और आगे बढ़ाया। राजू पाल की हत्या के बाद पूजा पाल को आगे बढ़ाया गया, वह बसपा से विधायक बनीं, लेकिन बाद में सपा में शामिल हो गईं। यह समाज लंबे समय तक बसपा का कोर वोटबैंक माना जाता था, लेकिन बाद में बीजेपी के साथ जुड़ गया। मायावती ने बसपा की कमान विश्वनाथ पाल को सौंपकर फिर से पाल जातियों का विश्वास जीतने का दांव चला है, तो सपा ने भी श्यामलाल पाल को आगे कर दिया है। 2022 में सपा को भी पाल समाज का वोट मिला है। पाल वोट के खिसकते आधार को देखते हुए बीजेपी भी अलर्ट हो गई है। उत्तर प्रदेश के चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि जो भी दल अति पिछड़ी जातियों के बीच गहरी पैठ बनाने में कामयाब होता है, पलड़ा उसी का भारी रहता है। पाल समाज चूंकि आर्थिक और सामाजिक रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है, इसलिए हर पार्टी इस ‘साइलेंट और मजबूत’ वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए गोलबंदियां कर रही है। पाल वोटों को साधे रखने के लिए बसपा से लेकर सपा तक ने अपने प्रदेश अध्यक्ष की कमान पाल समुदाय के नेताओं को सौंप रखी है। बसपा ने विश्वनाथ पाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, तो सपा ने श्यामलाल पाल को अपना प्रदेश अध्यक्ष 2024 के चुनाव में बनाया था। इसके अलावा बीजेपी ने पूजा पाल को प्रदेश संगठन में शामिल किया है और प्रकाश पाल को राज्यसभा भेजकर सियासी संदेश दिया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समाज से आने वाले नेताओं ने अपनी मजबूत पैठ बनाई है। समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों (जैसे बीजेपी और सपा) ने इस समाज के चेहरों को प्रदेश स्तर की बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारियां सौंपी हैं ताकि इस बहुमूल्य वोट बैंक को साधा जा सके। यूपी में सत्ता पाने के लिए महादेव जानकर की राष्ट्रीय समाज पक्ष, साहब सिंह धनगर की राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी, चन्द्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) व बाबूराम पाल की राष्ट्र उदय पार्टी जैसे राजनीतिक दल भी संघर्ष कर रहे हैं। देखना यह होगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में पाल-बघेल और धनगर समाज किसके सिर पर सत्ता का ताज सजाता है। -निरंजन सिंह पाल
यूपी में सबकी नजर-पाल समाज पर!
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Nice 👍