आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता। यह एक रोबोटिक कंप्यूटर सिस्टम है, जो वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई कृत्रिम बौद्धिकता है। यह बिल्कुल मानव मस्तिष्क की तरह ही कार्य करती है। चंद सेकंड में लगभग आपके हर सवाल का जवाब दे देती है। इसका आविष्कार अमेरिका के जॉन मैकार्थी ने किया है। यह टेक्नोलॉजी इंसानों के लिए सहायक भी है और डरावनी भी। यह सॉफ्टवेयर इंसानों की तरह सोचने वाली कंप्यूटर नियंत्रित बुद्धि है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक है। यह लगभग हर क्षेत्र में अपनी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण ढंग से निभा रही है। एआई तकनीक पर हम हॉलीवुड फिल्में देख चुके हैं जो हैरतअंगेज हुआ करती थीं। आज हर हाथ में यह तकनीक स्मार्टफोन के माध्यम से पहुंच चुकी है। हमारे देश में राष्ट्रीय स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कार्यक्रम की रूपरेखा नीति आयोग की देखरेख में आगे बढ़ाई जा रही है। भारत सरकार ने इस टेक्नोलॉजी के स्टार्टअप के लिए बजट का प्रावधान किया है, ताकि मशीन लर्निंग इंटरनेट आॅफ थिंग्स, कृत्रिम बौद्धिक क्षमता, रोबोटिक्स, डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग, बिग डाटा इंटेलिजेंस रियल टाइम डाटा और क्वांटम कम्युनिकेशन के क्षेत्र में शोध, प्रशिक्षण, संसाधन, कौशल विकास को बढ़ावा मिल सके। एआई का विकास बहुत ही तीव्र गति से हो रहा है। मशीनें अब एआई से कनेक्ट हैं और तेज गति से कार्य कर रही हैं और निर्णय भी लेती हैं। एआई के क्षेत्र में भारत, अमेरिका, इंग्लैंड, चीन, जापान काफी आगे निकल चुके हैं। यह गूगल के साथ कार्य कर रही तकनीक है। एआई सॉफ्टवेयर से हर क्षेत्र में कार्य कराया जा रहा है। इससे मनुष्य को आजीविका का संकट पैदा हो सकता है। साहित्य, कला, संगीत, सेना, फिल्म, चिकित्सा, खेल, शिक्षा, अध्यात्म, शिल्प, इंजीनियरिंग, वकालत, ज्योतिष, फार्मिंग, ट्रेफिक लगभग हर क्षेत्र में एआई का दबदबा है। इससे रोजगार के अवसर कम हो जाने की संभावना है। भारत में पहला स्वदेशी जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चैटबाट ‘हनुमान’ लॉन्च किया गया है। यह 98 भाषाओं में कार्य करता है। मशीनें व कंप्यूटर जब इंसानों की तरह सोचने, समझने, कार्य करने लगी हैं तो मानव को आत्मिक व भौतिक तौर पर हानि तो कहीं न कहीं उठानी पड़ेगी। हालांकि एआई के पास अभी स्वयं की सोच या समझ नहीं है। इंटरनेट पर जो डाटा पड़ा है, वो वहीं से सवालों के जवाब देती है। इसलिए एआई के हर जवाब को शत-प्रतिशत सही नहीं ठहराया जा सकता, यह कभी-कभी गलत जवाब भी दे सकती है। मनोस्तर पर यह इंसान के दिमाग पर असर डाल सकती है और इसके किसी भी रूप में इंसान को इसकी लत भी लग सकती है। इसके अत्याधिक इस्तेमाल से मानवीय रिश्तों पर प्रभाव पड़ सकता है। यह एक आभासी दुनिया है। इसके सही इस्तेमाल से वैज्ञानिक सभ्यता को विकसित किया जा सकता है तो हानि भी हो सकती है। वैसे तो हर वस्तु, टेक्नोलॉजी के सकारात्मक व नकारात्मक दोनों पहलू होते हैं। हमें काल्पनिकता से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया में कार्य करना चाहिए। फिर हर टेक्नोलॉजी सहायक ही साबित होगी।
-मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
गॉव-रिहावली, डाक-तारौली गुर्जर,
फतेहाबाद, आगरा-283111
मो. 9627912535
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस : सहायक भी और डरावनी भी!
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