गहन मानवीय वेदना एवं निवारण युक्ति!
भगवान बुद्ध अवतरित हुए, की बुद्धत्व सिद्धि!
धर्म, संस्कृति, मानवता, दिशाहीन होती जाए!
आडंबर, पाखंड, कट्टरता, जग में बढ़ती जाए!
बैशाख माह की पूर्णिमा, जन्म महानिर्वाण!
इसी दिन बुद्धत्व मिला, तजे देह से प्राण!
दुख, क्लेश, बीमारी, बुढ़ापा, मृत्यु की माया!
पीड़ित सभ्य समाज में, न थी सुख की छाया!
जग में सब दुखमय ही है, सुख आनंद की खोज!
सुख तलाश की चाह में, बढ़ता दुख का बोझ!
योगी निज शरीर पर, करता अत्याचार!
गृहस्थ सुविधा-भोगी बन, पालता अहंकार!
न अति तप, न भोग अति, मर्यादा में रहिए!
दुख का समाधान चाहिए, दुख-स्रोतों से बचिए!
न शाश्वत आत्मा रहती, न ईश्वर शाश्वत!
दुख, पीड़ा मिटती तभी, आनंद होता प्राप्त!
न तो अधिक विलासिता, न अत्यधिक हो तप!
चित्र की नहीं चरित्र की, हो चिंतन जप-तप!
ईश्वर होता ही नहीं, सब मूर्तिपूजा व्यर्थ!
अपना अंतर्मन सँवारो, नर होने का अर्थ!
सम्यक भाव से कीजिए, जीवन में सब काम!
न राम अमर अजन्मा, न आत्मा अंश का नाम!
बुद्ध कहें बुद्धत्व यही, दुख पाटते चलो!
प्रेम, दया, संवेदना, करुणा बाँटते चलो!
आत्मज्ञान, स्व-निर्भरता, तृष्णाओं का त्याग!
सत्य, शील, धारण करें, दुख मुक्ति का मार्ग!
ब्रह्मांड अनादि अनंत है, समय-चक्र आधीन!
प्राकृतिक नियमानुसार बनें, बढ़ें, विलीन!
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985
बुद्ध कहें बुद्धत्व यही…!
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