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अहिल्याबाई होलकर को महारानी के स्वरूप में स्थापित करें!

समाज के लोगों से अपील है कि अहिल्याबाई होलकर को महारानी के स्वरूप में स्थापित करें, न कि पुजारिन। अहिल्याबाई बहुत बड़े साम्राज्य की महारानी थीं, पुजारिन नहीं। उनके असली चरित्र को समाप्त करने का प्रयास न करें। महारानी का दायित्व निभाना कोई पुजारिन का चरित्र नहीं हो सकता है। उन्होंने मंदिरों की मरम्मत के लिए ब्राह्मणों को भिक्षा दी जो एक दयालु रानी का कार्य होता है। अहिल्याबाई ने एक भी मंदिर नहीं बनवाया है। केवल आक्रांताओं द्वारा लूट के समय टूटे मंदिरों की मरम्मत के लिए जो भी उनके पास आया उसे दिया। क्योंकि उस समय सबसे ज्यादा धन संपदा मंदिरों में ही हुआ करती थी जिसके कारण ताकतवर राजाओं द्वारा उस धन संपदा को लूटने के लिए मंदिरों को तोड़ा गया। महारानी से टूटे मंदिरों के पुजारियों द्वारा मदद मांगी गई जो महारानी ने दी, जो उनका फर्ज था। इसका मतलब यह नहीं कि वह महारानी के सारे कर्तव्य भूल गर्इं। मंदिरों में मरम्मत हेतु दिया गया दान उनके दयालु चरित्र को दर्शाता है, वह उनका कर्तव्य था, उसे स्वीकार करने का मतलब उनके बड़े कर्तव्य और इतिहास को छोटा करने जैसा होगा। दूसरी बात यह कि ब्राह्मण वर्ग चाहता है कि हमारे इतिहास को धर्म में दबाकर समाप्त कर दिया जाए। धर्म में हमारी हैसियत केवल मंदिर में घंटा बजाने के अलावा कुछ नहीं है। हम चुनौती देते है कि जिन्हें धर्म पर यकीन है वह किसी मंदिर की ठेकेदारी लेकर दिखाएं, उनकी असली औकात पता चल जाएगी। हमारे लोग स्वयं तो गुलाम हैं ही, साथ में हमारे महापुरुषों को भी गुलाम बनाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं जिसका जीता-जागता उदाहरण अहिल्याबाई को पुजारिन बना देना है, उनका महारानी का इतिहास भुलाने के लिए। समाज के प्रभावशाली एवं शिक्षित लोगों ने तो इतिहास और भूगोल दोनों पढ़े हैं। लोगों को समझाने और बताने कि कोशिश करें कि अहिल्याबाई होलकर एक महारानी थीं, वह कोई पुजारिन नहीं थीं। उनके इतिहास को बदलने की कोशिश न करें। अहिल्याबाई होलकर को महारानी अर्थात तलवार के साथ स्थापित करें, शिवलिंग के साथ नहीं। सामाजिक इतिहास ही सामाजिक दिशा सुनिश्चित करता है, कल्पना नहीं। एक बार विचार जरूर करें, किसी राजनैतिक व्यवस्था का शिकार न बनें। जिसने एक युद्ध नहीं लड़ा, जिसने चंद्रगुप्त मौर्य के आखिरी वंशज बृह्मदत्त को धोखे से मारा और साकेत को जो वर्तमान में अयोध्या है राजधानी बनाकर सत्ता हासिल की थी, वही पुष्पमित्र शुंग आज भगवान राम हो गये और हमारी महारानी जिन्होंने जाति, धर्म से ऊपर उठकर कल्याणकारी एवं न्याय व्यवस्था को स्थापित किया उसे हमारे लोग शिव का उपासक बनाकर समाज को गुमराह कर रहे हैं। एक बार इतिहास को पढ़ें, जानें, समझें, फिर समाज को दिशा दें, यही मेरी अपील है।
-डॉ. सुधीर कुमार पाल
एसोसिएट प्रोफेसर, महर्षि यूनिवर्सिटी
आॅफ इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, नोएडा
मो. 9005566201

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