गांधी अपन के देश में,
यह आज क्या हो रहा?
सब और यहां दमन है,
अमन ही तो रो रहा।
देखा था जो सपना,
सदियों से जन-जन ने,
लूट-फरेब झूठ के तंत्र में,
सब खो रहा।
वोट लोकतंत्र का,
जो अस्त्र था कभी?
कट रहा सरकार में,
पर लड़ रहे सभी।
संस्कृति के नष्ट का क्या
भीतरघात चल रहा?
गांधी अपन के देश में,
यह आज क्या हो रहा?
सब और यहां दमन है,
अब मन ही तो रो रहा।
दावे बड़े-बड़े किए;
नायक बने फिर रहे
अजीब झूठ खेल पर
अपने घर भर रहे।
क्या शान यहां दिख रही?
लाये लोकतंत्र की।
भ्रष्ट ही तो भ्रष्ट सब और दिखे;
गली-गली।
अजीब लोकतंत्र है;
कि रूप अब बदल रहा।
गांधी अपन के देश में,
यह आज क्या हो रहा?
सब और यहां दमन से,
अमन ही तो रो रहा।
आए यहां आप जैसा;
फिर करे काम वैसा।
दुखी-जीवन खुशी पाए;
हर कहीं जो खो रहा।
चारों ओर प्रेम बरसे;
आज जो नहीं रहा।
बापू पुकारे आपको,
ताबीज बांधों खो रहा।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
मो. 9794866822
गाँधी स्मृति…
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