अंधविश्वास, पाखंड और नकारात्मक रूढ़िवादिता किसी भी समाज के विकास में दीमक के समान होते हैं। ये इंसान की सोचने-समझने की क्षमता को कमजोर करते हैं और समाज को मानसिक गुलामी की ओर धकेलते हैं। परंपरा के नाम पर तर्कहीन बातों को बिना सोचे मानना प्रगति को रोक देता है।
तर्कहीनता और भय पर आधारित अंधविश्वास : बिना किसी ठोस प्रमाण या वैज्ञानिक आधार के, केवल अलौकिक शक्ति या अनहोनी के भय से नियमों को मानना अंधविश्वास है। यह कारण और परिणाम के संबंध को तोड़ देता है।
दिखावे और ठगी पर आधारित पाखंड : ज्ञान, धर्म या चमत्कार के नाम पर ढोंगी आचरण करना पाखंड है। इसमें जानबूझकर भेष बनाकर आम लोगों की श्रद्धा का शोषण किया जाता है, जिससे आर्थिक और मानसिक ठगी होती है।
समय से पीछे चलने वाली रूढ़िवादिता : पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही उन अमानवीय या अनुपयोगी परंपराओं को ज्यों का त्यों अपनाए रखना, जिनका वर्तमान समय में कोई औचित्य नहीं बचा है, रूढ़िवादिता है।
बौद्धिक क्षमता का विनाश : अंधविश्वास सवाल पूछने की आदत को खत्म कर देता है। जब हर घटना के लिए किस्मत, नजर या राहु-केतु को जिम्मेदार ठहराया जाता है, तो वैज्ञानिक सोच और जिज्ञासा समाप्त हो जाती है। ऐसा समाज तकनीक का उपभोक्ता तो बन सकता है, निर्माता नहीं।
गंभीर आर्थिक नुकसान : इसका सबसे बड़ा शिकार गरीब, मजदूर और किसान वर्ग है। मेहनत की गाढ़ी कमाई टोने-टोटके, ताबीज, भंडारे और ढोंगी बाबाओं पर बर्बाद हो जाती है। यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्पादक कार्यों में लगने के बजाय अनुत्पादक कार्यों में चला जाता है।
सामाजिक अन्याय और विभाजन : रूढ़िवादिता ने जातिगत भेदभाव, छुआछूत, विधवाओं के प्रति दुर्व्यवहार, बाल विवाह, दहेज प्रथा और बेटियों की शिक्षा पर रोक जैसी कुप्रथाओं को जन्म दिया है। इससे समाज का एक बड़ा हिस्सा विकास की दौड़ से पहले ही बाहर हो जाता है।
मनोवैज्ञानिक गुलामी : अंधविश्वास से ग्रस्त व्यक्ति हमेशा डर में जीता है। इस तरह का निरंतर भय तनाव, अपराधबोध और असहायता पैदा करता है। डरा हुआ समाज आत्मनिर्भर नागरिक नहीं, बल्कि अनुयायी पैदा करता है।
इनसे कोई लाभ नहीं, केवल हानि है : इनसे समाज को कोई स्थायी लाभ नहीं मिलता। आज तक किसी ताबीज ने नौकरी नहीं दिलाई, मेहनत ने दिलाई है। किसी भभूत ने बीमारी ठीक नहीं की, दवा और उपचार ने की है। अस्थायी मनोवैज्ञानिक दिलासे के अलावा इसका परिणाम केवल समय, धन और सोचने की स्वतंत्रता की हानि है।
इनसे मुक्ति के उपाय : वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना, हर बात को तर्क, तथ्य और प्रमाण की कसौटी पर परखने की आदत डालना।
व्यावहारिक शिक्षा का प्रसार : केवल साक्षर होना पर्याप्त नहीं है। ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो व्यक्ति को ठगी से बचाए और तार्किक सोच विकसित करे।
सामाजिक जागरूकता और बहिष्कार : पाखंड के धंधे को तभी रोका जा सकता है जब समाज उसका आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार करे।
सकारात्मक परंपराओं का चयन : जो परंपराएं मानवता के हित में हैं, समानता और दया पर आधारित हैं, उन्हें अपनाना चाहिए। जो परंपराएं पीड़ादायक और तर्कहीन हैं, उनका त्याग करना चाहिए।
-शेफर्ड नन्दकिशोर धनगर
मो. 9810624224
पाखंड, अंधविश्वास और रूढ़िवादिता : प्रगति के मार्ग की बाधाएँ!
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आभार व धन्यवाद जी