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बहुत जरूरी है शासन तंत्र में अपना वर्चस्व कायम करना!

वर्तमान हमारा भविष्य तय करता है और इतिहास हमारी गलतियों को बताता है, वर्तमान में अगर हम उपेक्षित हैं तो इसका कारण इतिहास में है। इतिहास हमें बताता है कि किसी समुदाय का राजनीतिक और आर्थिक रूप से शक्तिशाली हो जाना दूसरे के शोषण का कारण बनता है। समुदाय शक्तिशाली तब बनता है जब वह शासन तंत्र का हिस्सा हो, अगर समुदाय शासन तंत्र का हिस्सा नही है तो फिर वह समाजिक तौर पर उपेक्षित ही रहेगा और उस पर नियंत्रण रखने के लिए प्रभावशाली सम्पन्न समुदाय उसके आगे बढ़ने के सारे रास्ते बाधित रखेगा। इतिहास में जो समुदाय, जातियाँ शासन तंत्र का हिस्सा बन गईं वह सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी प्रभावशाली होती चली गईं। मुगल हो या ब्रिटिश हुकूमत, दोनों के लिये यह संभव ही नहीं था कि बगैर स्थानीय सहयोग से वह हिन्दुस्तान पर स्थायी शासन कर सकें। उसके लिए उन्हें स्थानीय वर्ग और जातियों का सहयोग मिला। किसी विदेशी के लिये किसी देश पर स्थायी शासन करने के लिये स्थानीय लोगों का सहयोग बहुत आवश्यक होता है। फौज से लेकर प्रशासन तक में स्थानीय लोगों का सहयोग किसी के भी शासन को स्थायी बनाता है जो स्थानीय लोगों की भाषा, रहन-सहन, सोच-विचार, रीति-रिवाज, व्यवहार को जान सकें और सत्ता और जनता के बीच एक पुल का काम कर सकें। अब ऐसे में जिन जातियों ने मुगल काल में मुगल दरबार में जी-हजूरी की वह शासन तंत्र का हिस्सा बन गये। जागीरें, रियासतों, जमींदारी के साथ कुछ अधिकार मिले तो वह सामाजिक और राजनीतिक तौर पर शक्तिशाली हो गये। क्योंकि किसी समाज का शासन तंत्र का हिस्सा बन जाने से वह समाज अपने हित में शासन तंत्र की नीतियों पर प्रभाव तो डालने ही लगता है, साथ-साथ सत्ता का संरक्षण मिलने पर वह अन्य समाजों पर अपना प्रशासनिक प्रभाव बनाने के लिये उनका सामाजिक शोषण भी शुरू कर देता है। शोषण के लिये जरूरी है कि वह दूसरे समुदाय को शासन तंत्र से दूर रखने के सारे प्रयत्न करता रहे, चाहे वह किसी ग्रंथ में कुछ लिखवाकर स्थायी सामाजिक विधान बनवा दे या फिर उसे असभ्य-नीच-कमीन कहकर उसका मानसिक आत्मविश्वास गिरा दे। आज भी अगर एक होमगार्ड आपको सड़क पर रोक दे तो आप उसे ‘दीवान जी, दीवान जी’ कहकर खुश करने की कोशिश करेंगे क्योंकि उसके सिर पर कानून-व्यवस्था है जो शासन तंत्र का एक हिस्सा है। किसी समुदाय का राजनीतिक वर्चस्व स्थापित हो जाना उसे सामाजिक वर्चस्व भी प्रदान करता है, फिर वह सामाजिक श्रेणी के उच्च पायदान पर बैठ जाता है। किसान, कारीगर और पशुपालक जातियों ने बेशक इस देश को कभी सोने की चिड़िया बनाया हो मगर इतिहास में उनका कोई उल्लेख इसलिए नहीं है कि उनका कभी शासन तंत्र में राजनीतिक वर्चस्व रहा ही नहीं, वह कभी भी दरबारी व्यवस्था का हिस्सा नहीं रहे। इसलिए जरूरी है शासन तंत्र में अपना वर्चस्व कायम करना, देश के नीति-निर्माण में अपनी हिस्सेदारी बनाना। फिर चाहे वह राजनीतिक हो, आर्थिक हो या प्रशासनिक हो, उसमें घुसने की कोशिश करना। नहीं तो बेलदारी करते-करते कई पीढ़ियां पहले भी खप चुकी हैं, तुम भी बैमौत मारे जा रहे हो और मारे जाते रहोगे।
-रामकृष्ण बघेल, ग्वालियर
मो. 7879705286

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