ग्रामीण अंचलों में निवासरत प्रत्येक सभ्य समाज जो संगठित होने का दावा करता है, निश्चित रूप से वह खाप-पंचायत के मकड़जाल में उलझा हुआ होगा। खाप-पंचायत आपसी विवादों को सगोत्रीय परिवार के द्वारा आपस में न निबटा पाने की स्थिति में कई गोत्र के सजातीय परिजनों को एकत्र कर संबंधित परिवार के विवाद को निष्पक्ष एवं निरापद उपायों से सुलझाने का एक स्वतंत्र और बेहतर विकल्प था। खाप-पंचायत धार्मिक अथवा दार्शनिक स्थलों पर आयोजित होती थी। लगभग सभी गोत्र एवँ गाँव, शहर में निवासरत सजातीय परिजन आपस में मिलते थे। प्रति परिवार किलो-दो किलो चावल, दाल, नमक, मिर्च, सूखी सब्जी और रुपये-दो रुपये का आर्थिक सहयोग एकत्र करते, पकाते, सामूहिक भोज होता, फिर पारिवारिक विवादों को दोनों पक्ष वादी-प्रतिवादी के द्वारा सुनते, सुलझाने हेतु सामूहिक चिंतन करते और निष्पक्षता का ध्यान रखते हुए विवादों का निराकरण करते। पाँच पंच नियुक्त होते, जो सबकी सहमति से लिये गये निर्णय को खड़े होकर सभ्य समाज को बता देते। दोषी पक्ष को समझाइश दी जाती। आत्मिक संबंध में प्रगाढ़ता का विस्तार करते। इस व्यवस्था से अशिक्षित, अल्प शिक्षित, गरीब परिवारों को समाज के सुसंपन्न लोगों से संरक्षण और सुझाव प्राप्त होते थे। लोग एक-दूसरे का सहयोग करते थे। खाप पंचायत पुरखों के द्वारा समाज को संगठित करने, अलग-अलग गोत्रों के सजातियों से संपर्क बढ़ाने, नाते-रिश्तेदारों की खोज-खबर रखने का सामाजिक ताना-बाना था। अब खाप-पंचायत अपने उद्देश्य से भटक चुकी हैं। खाप-पंचायत की व्यवस्था अब कुटिल, गुटबाज और जालसाजों के चंगुल में उलझ गई है। जिनके गोत्र और परिजनों की संख्या अधिक है, उनकी मनमानी को खाप-पंचायत के अनुयायियों की भीड़ पर थोपा जा रहा है। सभ्य समाज के नेतृत्वकर्ताओं ने अर्ध-मूर्छित भीड़ को अपना गुलाम बना रखा है। अब दोषी पक्ष से डाँड़ के नाम पर भारी-भरकम रकम वसूली जाती है। खाप-पंचायत के संचालकों द्वारा हर अपराध पर जो सजा दी जाती है वो ग्यारह हजार से एक लाख तक ‘डाँड़’ यानि (आर्थिक सजा) और सामाजिक भोज अथवा दोनों होती हैं। नहीं देने पर सामाजिक बहिष्कार किया जाता है। सामाजिक बहिष्कार का अर्थ है बेटे-बेटियों के विवाह पर, छट्ठी-बरहों पर, शवयात्रा, दाह संस्कार, दशगात्र अथवा तेरही कार्यक्रम में परिवारजनों के शामिल होने पर रोक लगाना। शामिल होने वाले परिजनों को भी बहिष्कृत कर दिया जाता है। अब सुसभ्य समाज में चुनाव जीतकर अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष, पार प्रमुख, पाली प्रमुख बनकर, महिला कमेटी, युवा कमेटी गठित करके सभी पदों पर चतुर-सुजान लोग काबिज होकर डाँड़ वसूली और सामाजिक बहिष्कार की नीतियों के संचालक बन बैठे हैं। डाँड़ की रकम के निर्धारणकर्ता बन बैठे हैं। ये अपने और अपने रिश्तेदारों के लिए कुछ अलग वैल्यू का ‘डाँड़’ और दूसरे स्वजातियों के लिए अलग वैल्यू का ‘डाँड़’ सुनाते हैं। आज की स्थिति ऐसी हो गई है कि खाप-पंचायतों के संचालक डॉन और आम आदमी गुलाम बना बैठा है। खाप-पंचायतों के डॉन नील में भीगे भेड़िये की तरह खुद का महिमा मंडन करते हुए सभ्य समाज के आम आदमी के न्यायाधीश बनकर डाँड़ वसूली करने का काम कर रहे हैं। इनका आतंक इतना हावी है कि सामान्य व्यक्ति इनके द्वारा संचालित बैठक में ही नहीं आते। समाज हित में शुभचिंतन के बारे में ये स्वप्न में भी नहीं सोचते। इनका उद्देश्य बस इतना रह गया है कि समाज के लोगों के विवादों पर आवेदन लो, वादी-प्रतिवादियों की दलीलें सुनो, दोषी पक्ष से ‘डाँड़’ वसूलो और अपना वर्चस्व कायम रखो। इनकी सगोत्रीय परिजनों की संख्या अधिक होने के कारण आप ‘अन्ना हजारे’ होकर भी इन ‘केजरीवालों’ के पार नहीं पा सकते। खाप-पंचायत के संचालकों के डाँड़ वसूली के प्रमुख स्रोत-
- लिव-इन रिलेशनशिप संबंधों के दोषी पुरुष।
- सगोत्रीय प्रेमी-प्रेमिका।
- इनके दोषों को उजागर करने वाले।
- दारू पीकर बैठक में बहस करने वाले।
- इनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने वाले।
- खाप पंचायत की गलत नीतियों के विरोधी।
समाज सुधारक, बुद्धिजीवी, लेखक, कविगण को ये फूटी आँख नहीं भाते, देश में संविधान न होता तो ये लोग इन्हें काला पानी भेज देते या तड़ीपार कर देते।
खाप-पंचायतों के संचालक एवं आयोजक- - टेंट, भोजन, का कार्यभार संभालने वाले।
- मंच पर माला, नारियल पहनकर फूले न समाने वाले।
- इनके चाचा-ताऊ, जीजा-दीदी, मौसी-मौसा, बुआ-फूफा, समधी-समधन, साढ़ू-साली, भांजे-भतीजे। चुनावी वर्षों में इनके समस्त परिजन, आम-आदमियों की टोटल भीड़ में आधी से अधिक जनसंख्या में होते हैं। चुनाव और मतदान की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही लोग समझ जाते हैं कि किस पद पर कौन आसीन रहेगा। कई रिश्तेदार वादी-प्रतिवादियों के सीसीटीवी कैमरे होते हैं। इनकी मर्जी के बिना आप एक छोटा सा पद नहीं ले सकते। इनका वर्चस्व इतना प्रभावशाली है कि आप कानून का सहारा भी नहीं ले सकते। क्या खाप-पंचायतों से स्वतंत्र होगा ‘दासता और चापलूसी का आदी सभ्य समाज’?
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985