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लोकतंत्र में महिला अधिकारों पर महाभारत!

देश की मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव प्रणाली पर आजादी मिलने के बाद से ही संदेह किया गया। जहां पहले सिर्फ राजे-महाराजे ही वोट करते थे, उनके वोट की कीमत सिर गिरने से नहीं, अपितु उनके प्रभाव, उनकी रियासत से आंकी जाती थी। इधर एक मानव एक वोट एक गिनती पर आज सरकार की गुणवत्ता आंकी जा रही है। पिछले सप्ताह 16 अप्रैल से 18 अप्रैल तक बहस चली और मतदान हुआ लेकिन वोट जब गिने गए तो सरकार की गुणवत्ता, अच्छे दिन आएंगे की कल्पना ढह गई। जनता के चुने प्रतिनिधियों ने वर्तमान सरकार की नीतियों को सिर्फ सत्ता में एनडीए सरकार बनी रहे, इसके लिए यह बहस थी। वह जनमत अपने पक्ष में करने का एक वैचारिक विज्ञापन था। महिला आरक्षण बिल चुनाव के दौरान लाना, बीजेपी सरकार दो राज्यों में भी बन जाए फिर संविधान को अपने ढंग प्रभावित करके बदल देंगे, यह निष्कर्ष निकाला गया। विपक्ष ने तो संसद में महिला आरक्षण पर महाभारत जारी रखा था ही कि इधर इतनी प्रेस वार्ताएं रोज हो रही हैं, कोई किसी को कुछ भी बोल दे रहा है। उसमें एक महिला अधिकारों पर वैचारिक महाभारत चल रहा है। दोनों राज्यों में चुनाव प्रचार में स्वीगी पॉलिटिक्स (हमें चुनें, हम आपके घर पर 8000 रुपये का कूपन भेज देंगे, जो चाहे ले ले। तमिलनाडु में महिलाओं के खाते में 5000 रुपये पहुंचा दिए गए।) यह स्वीगी पॉलिटिक्स डिलीवरी देती है, घर पर वोट के लिए कुछ पहुंचाएगी, यह नई बहस आई है। मैंने भी अपने जीवन काल में पिछले समय के प्रधानमंत्री लोगों को होश से सुना है। उनमें स्वर्गीय राजीव गांधी, स्वर्गीय विश्वनाथ प्रताप सिंह, स्वर्गीय चंद्रशेखर, स्वर्गीय नरसिंह राव तथा स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई प्रमुख हैं। जो हम समझते हैं कि एक आदर्शवादी प्रेरणादायक संबोधन करते थे। तेरी मेरी की शुरूआत तो वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काल से ज्यादा शुरू हुई, उसमें पहले शुरूआत तो सोनिया गांधी ने ‘मौत का खूनी सौदागर’ से की थी। क्योंकि वह परदे के पीछे से वार था, वह परदे के पीछे की प्रधानमंत्री ही थीं। उनके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक ईमानदार, देशभक्त नायक थे। अब तो मल्टीमीडिया के प्लेटफार्म पर बार-बार वही बहसें चलाई जा रही हैं जो लोकतंत्र के सामने एक वैचारिक उन्माद सा लगता है, गलत-सही का हिसाब नहीं लग पा रहा है। लेकिन अब बहस के निष्कर्ष से निकल रहा है कि ओबीसी जाति जनगणना के बाद बढ़ी हुए अनुपातिक भागीदारी के तहत महिला आरक्षण होरिजेंटल रूप से एससी, एसटी, ओबीसी या सबको दिया जाए। यह कार्य बिना वर्टिकल आरक्षण बढ़ाये संभव नहीं है। कई नहीं, अधिकतर सांसदों ने बहस में अपनी बात रखी है। यह लोकतंत्र के इतिहास में 140 करोड़ जनसंख्या वाले देश में शुभ संकेत ही है कि जो महाभारत शुरू हुआ है वह सही परिणाम लाएगा। लेकिन कब तक, यह भविष्य के गर्भ में है। मेरा अपना मत है कि ओबीसी सांसद किसी भी पार्टी के हों, एक समावेशी, भागीदारी और सहभागिता पर राय रखकर ओबीसी समाज हित के लिए मिलकर कार्य करें ताकि संसद में आधी आबादी को भी सही प्रतिनिधित्व मिल सके। यह अब समय की मांग है। ओबीसी समाज के वोट के साथ तभी सही न्याय होगा जब यह समझा जा सकेगा।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
परास्नातक जनसंचार
मो. 9794866822

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