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लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

मां की स्व-महिमा होती है!

शिशुओं का पूर्ण जहां होती है!
मां की स्व-महिमा होती है!
संतानों की सृष्टि रचतीं
संतानों पर दृष्टि रखतीं
खुद को दांव लगाती है
तब अपनी गोद सजाती है
हवन में खुद को झोंका करती
वंशज आंगन में रोपा करती
जीभ चटोरी साधती है
तब संतानों को पालती है
देवी की गरिमा होती है!
मां आखिर एक मां होती है!
खून से सींचा करती है
तब बीज बड़ा वो करती है
अमृत सम दूध पिलाती है
कद, समझ, विचार बढ़ाती है
सेवा, मालिश करती खूब
पुष्ट, निरोगी रखती खूब
निडर, प्रखर चिंतन देती
आरोग्य भरा तन-मन देती
प्रथम गुरु खुद मां होती है!
बच्चों में मां की जां होती है!
मां का मन मक्खन समझो
सरल व श्रेष्ठतम समझो
आघात कभी पहुंचाना मत
ममता को कभी रुलाना मत
इक ठेस भी रब न भूलेगा
आफत-विपदा में डालेगा
ममता का सम्मान करो
आजीवन शान से जियो मरो
रब पर भी मां की कमान होती है!
मां की स्व-महिमा होती है!
वृद्ध अगर हो जाए मां
क्रुद्ध अगर हो जाए मां
तुम जिह्वा अपनी जलाना मत
शीतलता को झुलसाना मत
ताप सह के मुंह सी लेगी
घुट-घुट कर भी वह जी लेगी
इस दशा में लेकिन लाना मत
सृष्टि कर्ता है, चिढ़ाना मत
संभव है मौन प्रलय आए
सुख-चैन, उन्नति ढह जाए
आशीष भरी जुबां होती है!
मां की स्व-महिमा होती है!
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985

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