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मायका

‘बेटी के लिए मायका सिर्फ एक घर नहीं, एक रूहानी सुकून होता है। पर क्या वो सुकून माँ की अंतिम विदाई के साथ ही दफन हो जाता है या फिर रिश्तों की कड़वाहट उस सुकून को लील जाती है?’ ​बरसों बाद जब निशा ने अपने पुराने घर की दहलीज पर कदम रखा, तो उसे उम्मीद थी कि माँ की यादें उसे गले लगा लेंगी। पर सामने खड़ी छोटी भाभी तनु की नजरों में वो ममता नहीं, एक अजीब सी बेरुखी थी। ​निशा को देखते ही तनु के हाथ में थमा पानी का जग जैसे ठहर गया। उसने फीकी मुस्कान के साथ कहा, ‘अरे निशा दीदी? आप… और अचानक? बिना किसी खबर के?’ ​निशा ने सूनी आँखों से घर की दीवारों को निहारा और धीमे से बोली, ‘भाभी, अपने ही घर आने के लिए क्या खबर देना जरूरी है? मेरा मन माँ की यादों में छटपटा रहा था, बस चली आई।’ ​तनु ने दरवाजे से हटते हुए तंज कसकर कहा, ‘यही तो आपकी सबसे बड़ी गलतफहमी है दीदी। जब तक माँ जी थीं, ये घर आपका था। अब माँ नहीं रहीं, तो ये हक भी खत्म हो गया। अब ये मेरा घर है, और यहाँ मेहमानों का बिना बताए आना थोड़ा अजीब लगता है। अगर मैं घर पर न होती, तो आप बाहर ही खड़ी रह जातीं।’ ​निशा का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच दिया हो। वह सुबकते हुए माँ की तस्वीर के सामने जा बैठी और बिलख पड़ी, ‘माँ… तुम क्या गईं, इस घर की हवाएं भी पराई हो गईं। क्या सच में माँ के साथ ही बेटी का मायका खत्म हो जाता है?’ ​तनु पानी का गिलास लेकर आई और बेबाकी से बोली, ‘रोने से क्या होगा दीदी? ये जो परायापन आपको महसूस हो रहा है, ये आज की उपज नहीं है। ये आपके ही बोए हुए कड़वाहट के बीजों का फल है।’ ​निशा ने चौंककर आँसू पोंछे, ‘भाभी, तुम क्या कह रही हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?’ ​तनु की आँखों में बरसों का दबा हुआ दर्द सैलाब बनकर उमड़ आया। उसने पास बैठकर कहा, ‘भूल गईं आप? जब मैं इस घर में नई-नई आई थी, आपने मेरा वजूद मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मेरी हर छोटी बात पर माँ जी के कान भरना, मेरी पसंद की चीजों को अपना बताकर छीन लेना…यहाँ तक कि मेरी बीमारी में भी आपने मुझे आराम नहीं करने दिया। आपने मुझे कभी इस घर की बहू समझा ही नहीं, बस एक काम करने वाली मशीन समझा। आपकी हर मर्जी चलती थी और मेरी हर ख्वाहिश दबा दी जाती थी। आज माँ नहीं हैं, तो आपको अपनापन चाहिए? पर मेरे दिल में तो आपने सिर्फ जख्म छोड़े हैं।’ ​निशा को एक-एक करके अपने पुराने शब्द और व्यवहार याद आने लगे। उसे अहसास हुआ कि उसने अनजाने में (और कभी जानबूझकर) तनु के आत्मसम्मान को कितनी बार ठेस पहुँचाई थी। ​निशा ने सिर झुका लिया और रुंधे गले से कहा, ‘भाभी…मुझे माफ कर दो। मैं उस वक्त सत्ता के नशे में अंधी थी। मुझे लगा था कि मैं बेटी हूँ तो मेरा हक सबसे ऊपर है। आज जब माँ नहीं हैं, तब समझ आ रहा है कि घर सिर्फ माँ से नहीं, उन रिश्तों से होता है जो हम पीछे छोड़ जाते हैं। मैं…मैं आज ही शाम की ट्रेन से वापस चली जाऊंगी।’ ​तनु ने गहरी सांस ली। उसका स्वर थोड़ा कोमल हुआ, ‘दीदी, भागना समाधान नहीं है। माँ से मायका शुरू जरूर होता है, पर उसे जिंदा रखने की जिम्मेदारी भाई और भाभी की होती है। लेकिन ये तभी मुमकिन है जब ननद भी उस रिश्ते को सम्मान दे। अगर आप अपनी गलती मान रही हैं, तो रुकिए…इस घर की चाय आज भी उतनी ही मीठी बनती है जितनी माँ बनाती थीं।’ ​निशा ने तनु का हाथ थाम लिया और फूट-फूट कर रोने लगी। ‘भाभी, मुझे अपना मायका वापस चाहिए। मुझे अधिकार नहीं, बस आपका प्यार चाहिए। मैं वादा करती हूँ, अब इस घर में ‘बेटी’ का रौब नहीं, बल्कि एक ‘बहन’ का प्यार लेकर आऊँगी।’ ​तनु ने भी आगे बढ़कर निशा के आँसू पोंछे और उसे गले लगा लिया। उस दिन माँ की तस्वीर के सामने एक पुराना रिश्ता दम तोड़ रहा था और एक नया, गरिमामय रिश्ता जन्म ले रहा था। ​रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि एक-दूसरे को दिए गए सम्मान से चलते हैं। मायका तभी तक मायका रहता है जब तक वहां रिश्तों में कड़वाहट की जगह सद्भावना हो। ननद और भाभी का रिश्ता अगर विश्वास की डोर से बंधा हो, तो वह हर तूफान को झेल सकता है।
-डॉ. अमर पाल, ब्यूरो चीफ, लुधियाना
मो. 9888100609

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