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लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

ओबीसी वर्ग के नायक अपनी लड़ाई लड़ने के लिए आगे आएं!

लोकतंत्र में अब बहसें बड़ी आम बात हो गई हैं। बात रखने के लिए कितने ही मल्टीमीडिया प्लेटफार्मों पर लोग अपने-अपने हकों, अधिकारों के लिए अब पहले से ज्यादा सजग हो चले हैं। संसद भवन में जो नारी वंदन अधिनियम 2023 को लेकर के 16, 17 और 18 अप्रैल में बहस चली उसमें लोकतंत्र की बहुदलीय प्रणाली ने अपने नफा-नुकसान से पैंतरेबाजी में अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों की सोच के ढंगों से उसके गुण-दोष की विवेचना की गई। उसमें एक बात स्पष्ट रूप से निकलकर आई कि अब कोई भी शासित पार्टी अपने मनमानेपन से अपना ही विचार लादकर या अपनी बात मनवाकर देश में शासन नहीं कर पाएगी, चाहे जितना अपने को सही ठहराए। कारण, जब परिणाम आया तो सरकार को 298 मत मिले। विपक्ष ने 230 मत डालकर सरकार को हरवाया। बहस जो चली तीन दिन, वह तीन बिंदुओं पर केंद्रित रही। मौजूदा स्थिति में महिलाओं को 33% आरक्षण मिले, जाति जनगणना हो जाए और आनुपातिक रूप से आंकड़े आने के बाद परिसीमन करके बढ़ाई गई सीटों पर ओबीसी महिलाओं या ओबीसी समाज को 50% आरक्षण के साथ महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए; तब नारी वंदन अधिनियम-2023 आने वाले समय में 2027 तक लागू हो पाएगा। आंकड़ों के आने के बाद फिर 2029 के लोकसभा चुनाव में इसे लागू किया जाएगा। तमाम राजनैतिक दलों की नाराजगी और गहरे आक्रोश के बीच यह बहस हुई। वैचारिक रूप से नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने तो भाषा की मर्यादा ही तोड़ दी। उन्होंने यह आरोप लगाया कि सरकार की नीयत चुनाव प्रभावित करने की है जो इस समय दो राज्यों बंगाल और तमिलनाडु में होने जा रहे हैं। यह खेल ताली बजाने और जनसामान्य को अपनी ओर आकर्षित करने का है। यह एक प्रकार से हुनर से ऐब करना प्रदर्शित कर रहा है जो अब स्वीकार नहीं है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने जातीय जनगणना कराने तथा 50 प्रतिशत महिला आरक्षण की वकालत की। मेरा अपना भी मत पत्रकारिता व जन सरोकारी पत्रकारिता के चलते यही है कि विपक्ष भी इस समय अपनी बात पहली बार ढंग से रख पाया। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है कि आम राय ली जाए, चुनाव जीतने के लिए नैतिक आदर्शों को जगह मिले ना कि वोटरों को लुभाया जाए, चुनाव के दौरान पैसा बांटा जाए। अब राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ चली है कि वह सही विकल्प निकालें। ओबीसी महिलाओं का आशाभरी कातर दृष्टि से देखना स्वाभाविक है कि आने वाले समय में कितनी चालबाजियों के बीच उसे जगह मिलेगी, जगह मिलेगी भी कि नहीं? या वह फिर से इस्तेमाल ही की जाएगी, यह बड़ा सवाल बना है। इसके लिए सभी दलों को नए पैमाने निश्चित रूप से बनाने होंगे। आरक्षण बिना मिले जटिल भारतीय सामाजिक संरचना का ढांचा नहीं बदलेगा, यह तो निश्चित है। उसे अब 50% तक अपनी उपस्थिति दर्ज करनी है। ओबीसी वर्ग की अपनी सहभागिता की आधी-अधूरी लड़ाई लड़ने के लिए नायक आगे आएं। इसमें राजनीतिक दलों की सीमाओं को छोड़ पिछड़े वर्ग की महिला व पुरुष दोनों नायकों को अपने हित की बहस करनी ही पड़ेगी। हम समझ रहे हैं कि इससे एक नए भारत के निर्माण को बनने से अब कोई रोक नहीं पाएगा, तभी पिछड़े वर्ग की महिला का भी सम्मान सुनिश्चित होगा और नारी वंदन अधिनियम-2023 परिसीमन के नए आयामों के साथ नए भारत के इतिहास का हिस्सा भी बनेगा। आशा है कि भारत की अगड़ी-पिछड़ी सभी नारी शक्ति इस बहस में सही निर्णय निकालेंगी।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
परास्नातक जनसंचार
मो. 9794866822

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