खुद को कर बुलंद इतना हर पार्टी आकर पूछे बता तेरी रजा क्या है? यह तब सम्भव होगा जब समाज के अगवाकार अपना स्वार्थ त्यागकर एक नेतृत्व को स्वीकार करेंगे। पिछले दो दशक से अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए कितने ही प्रदेश अध्यक्ष, युवा अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष, राष्ट्रीय अध्यक्ष का टैग लेकर अपने अहम की पुष्टि करने का कार्य कर रहे हैं। इनके अहम से समाज का कोई हित नहीं हो रहा है और न होगा। इन अध्यक्षों की मंच-माला-सम्मान में ही समाजसेवा समाप्त हो जाती है। बड़े अफसोस की बात है कि हमने इतिहास से सबक नहीं लिया। जो समाज एक नेतृत्व में एक नाम से चला, अग्रणी हो गया चाहे यादव हों या गुर्जर हों। किसी भी कार्यक्रम में बैनर में बिखराव का प्रदर्शन होता है पाल, बघेल, धनगर, गाडरी, होलकर आदि लिखने से। एक साधे सब सधै जब तक एक नेतृत्व एक विचार नहीं होगा, ठोकरें खानी ही पड़ेंगी। याचक बनकर अन्य पार्टियों के चक्कर लगाते रहना होगा। इतना बड़ा समाज है हमारा किन्तु राजनैतिक भागीदारी न के बराबर, प्रशासनिक सेवाओं में भागीदारी न के बराबर है। अभी आरएएस के परिणाम में एमबीसी में 83 में से मात्र 3 (गाडरी और पुरबिया सरनेम) का चयन हुआ है। इसलिए अहम और वहम त्यागकर ‘संघे शक्ति कलयुगे’ के अनुसार एक नेतृत्व में जब आओगे, सबमें होगी भागीदारी, सम्मान भी पा जाओगे।
-गिरजेश पाल, जयपुर
मो. 9413672666
एक नेतृत्व एक विचार को स्वीकार करना होगा !
0
0
votes
Article Rating
Subscribe
Login
0 Comments
Oldest
Newest
Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments