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कोई उदास अपने वास!

(मधुगीति 260409 B) 00:39
कोई उदास अपने वास, त्रास में रहे;
विंदास कोई जगत रहे, सृष्टि निहारे!
बंधन में कोई बँधे मन के, हीनता गहे;
बेड़ियां अपनी तोड़े चहे, साधना करे!
सम्भव है मुक्त होना, व्याधि चिंता मिटाना;
कर समर्पण के स्वत्व, विश्व त्राता से मिलना!
ले दीक्षा कर समीक्षा, जो है ध्यान में रमता;
क्षमता अनन्त पाता, और जगती सुहाता!
हो विश्व-पति के बेटे, भिक्षु क्यों यहाँ बने;
‘मधु’ चरण पकड़ उनके, क्यों न सेवा हो किए!
-डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com

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