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लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

बहुजन समाज झूठ और सच में फर्क करना सीखे!

संविधान बचाओ संघर्ष समिति द्वारा संविधान की सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ करने हेतु तमाम कार्यक्रम किए गए थे जिन्हें सराहनीय कदम माना जा सकता है। परन्तु संविधान के किस अनुच्छेद में यह लिखा गया है कि जो सनातन का झंडा बुलंद करें उनके किसी भी आपराधिक कृत्य को गंभीरता से नहीं लिया जाता है? ऐसे लोगों की जमानत का पुलिस विरोध भी नहीं करती है, उन्हें तुरंत जमानत भी मिल जाती है। ऐसा बहुत बार देखने में आया है। जो लोग सत्ता से सवाल पूछते हैं उन पर संगीन धाराओं में केस किया जाता है और पुलिस जमानत का जबरदस्त विरोध करती है। तमाम तो जेल में ऐसे बंदी भी होंगे जिनके द्वारा किए गए अपराध की सजा एक, दो या तीन वर्ष हो सकती है परन्तु उन्हें जेल में रहते पांच-पांच, छह-छह साल हो गए और उनके ट्रायल भी अभी तक शुरू नहीं हुए। जिनके पास अधिक पैसा और सोर्स है, ऐसे लोग गंभीर अपराध के बावजूद कानून के फंदे में नहीं हैं और सामान्य व्यक्ति छोटे-छोटे अपराध में भी लंबे समय तक कानून के शिकंजे से बाहर नहीं आ पाता है। 1975 में जब आपातकाल लागू किया गया था, पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी को उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा उनके चुनाव जीतने को गलत ठहराया गया और उन्हें इसके लिए अयोग्य करार दिया गया था। उसका कारण उच्च न्यायालय ने यह माना था कि श्रीमती गांधी ने अपने लोकसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार के लिए जो मंच तैयार कराया था उस मंच में बिजली व कुछ अन्य खर्चों में सरकारी खजाने का इस्तेमाल किया गया है जो चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है। दूसरा कारण जो बताया गया था कि पीएमओ का अधिकारी जो सरकार का होता है, चुनाव व्यवस्था में उसका इस्तेमाल किया गया है। आज के समय में तो यह सब बातें आम हैं। चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन में चुनाव आयोग के फैसले स्वयं गवाही देते हैं कि वहां भी खेल किया जाता है। एक पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा इस बात का प्रमाण हैं। पिछले 10-12 साल में भाजपा ने उन सभी लीकेज को भरने का काम किया है जहां से सत्ता परिवर्तन की संभावना बनती है। साथ ही कांग्रेस के पतन के कारणों से भी सबक लेने की कोशिश की है, भले ही ऐसी कोशिश में साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अपनाई गई हो और वह प्रक्रिया भले ही असंवैधानिक हो। उन्हें लगता ही नहीं है कि इस देश में उनके रहते सत्ता परिवर्तन होना संभव है। इससे एक बड़े खतरे की आहट भी सुनाई देती है कि यदि किसी प्रकार सत्ता परिवर्तन हो भी गया तो जो भी लोग सत्ता में विराजमान होंगे वे भी इसी प्रकार सत्ता सुरक्षित करने के उपक्रम कर सकते हैं। बहुजन समाज भली-भांति उन बातों से परिचित है कि किस प्रकार सदियों पहले सत्ता बरकरार रखने को तमाम प्रकार के शास्त्रों की रचनाएं की गईं। शिक्षा और संपत्ति से दूर करने के पीछे भी यही थ्योरी काम कर रही थी कि एक लंबे समय तक शासन करने के लिए लोगों को मूर्ख बनाए रखना आवश्यक है। आरएसएस का तो यह एक आजमाया हुआ नुस्खा है। इसे बहुजन समाज अभी भी एक राजनीतिक लड़ाई समझ रहा है जबकि ऐसा नहीं है। झूठ बोलना आरएसएस का पुराना हथियार रहा है, इसलिए भाजपा के कुछ नेता भी बहुत आसानी से झूठ बोल लेते हैं। बहुजन समाज को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए आवश्यक है कि वे झूठ और सच में फर्क करना सीखें। इन्हें झूठ और फरेब में उलझाकर ही वोट लेने का उपक्रम किया जाता है और यह चलता ही रहेगा। इसी संदर्भ में एक लघु कविता प्रस्तुत है-
आशा छोड़ो खुद को संभालो,
खुद अपना अस्तित्व बचा लो।
जाल बिछाए बैठे दानव,
नेता सब बिक जाएंगे,
सुनो बहुजनों खुद को बचा लो
अब पेरियार न आएंगे।।
कब तक आस लगाओगे
इन बिके हुए गद्दारों से,
सच्चाई से दूर भागते,
टीवी और अखबारों से,
अधिकार छीनने को जो आतुर
वह क्या तुम्हें बचाएंगे?
सुनो बहुजनों खुद को बचा लो
अब फूले नहीं आएंगे।।
कल तक केवल अनपढ़ राजा,
अब गूंगा बहरा भी है,
होंठ सिल दिए हैं जनता के,
कानों पर पहरा भी है।
तुम्हीं कहो यह अश्रु तुम्हारे,
इनको क्या पिघलाएंगे?
सुनो बहुजनों हिम्मत कर लो
अब अंबेडकर न आएंगे।
।
-श्रीपाल सिंह, आगरा
मो. 7906162116

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