भारतीय समाज में वृद्धजनों की क्या है स्थिति और क्यों बनी ऐसी स्थिति, कौन है इसके लिए जिम्मेवार? यह जानना वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक है क्योंकि आने वाले कुछ दशक में वह भी वृद्धजनों की श्रेणी में आ जाएंगे। हम स्वतंत्रता के पूर्व लगभग 100 वर्ष के पहले चलते हैं और देखते हैं कि उस समय वृद्धजनों की स्थिति क्या और कैसी थी। आज से 100 वर्ष पूर्व जब हमारा देश स्वतंत्र नहीं हुआ था तब की स्थिति में उतने भौतिक संसाधन उपलब्ध नहीं थे और ना ही किसी प्रकार की ज्यादा टेक्नोलॉजी थी, जो थी वह केवल महानगर में विशेष लोगों के लिए थी। उस समय हमारे वृद्धजन बहुत सम्मानित और स्वस्थ रहा करते थे, मेहनत भी अच्छी किया करते थे। उस समय हमारे भारतीय समाज में छोटी-छोटी रियासतें थीं और लोग अपने कृषि कार्य, पशुपालन एवं कुटीर उद्योगों के माध्यम से जीवकोपार्जन किया करते थे तथा अपने परिवार पर संस्कार और संगठन की दृष्टि से बहुत ही मजबूत पकड़ बनाकर रखते थे। तत्कालीन समय में वृद्धजनों की बिना सलाह लिए कोई भी निर्णय नहीं होता था, कोई भी परिवार का सदस्य विघटन के बारे में नहीं सोच सकता था, अलग रहना तो दूर की बात है। इसे हम कबीला प्रथा भी कह सकते हैं। धीरे-धीरे समय निकलता गया और राष्ट्र स्वतंत्र हुआ। सन 1950 में देश में संविधान लागू हुआ 26 जनवरी को और देश संविधान की व्यवस्था के अनुसार विकास के नाम पर आगे बढ़ता गया। रेल लाइनें, सड़कें, पुल-पुलिया, नए शहरों का निर्माण, आधुनिक शिक्षा पद्धति और देखते-देखते 80 वर्ष में आज हम विकसित भारत का सपना देखने लगे हैं। स्वतंत्रता के इन 80 वर्षों में एक और जहां भौतिक रूप से विकास हुआ है, आधुनिकता के दौर में हम चांद व मंगल ग्रह तक पहुंच रहे हैं। किंतु वैचारिक व बौद्धिक रूप से आज जो हमारा भारतीय समाज है, उसके पास वृद्धजनों की दयनीय स्थिति के बारे में सोचने का समय नहीं है। आज देश में कानून और संविधान है, फिर भी वरिष्ठ नागरिकों व वृद्धजनों के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाया जा रहा। उनके साथ हो रहे अन्याय व अत्याचार की घटनाएं चीख-चीख कर इस बात की गवाही दे रही हैं। युवा वर्ग से यही निवेदन है कि इस बारे में चिंतन-मनन करें क्योंकि आने वाले कुछ दशकों में आपको भी इसी प्रक्रिया से जीवन गुजरना होगा। आइए, देखते हैं कि भारतीय समाज में वृद्धजनों की क्या स्थिति है-
- पारिवारिक और सामाजिक स्थिति चिंताजनक है : आधुनिकता के चक्कर में बच्चे अपने माता-पिता को गांव में अकेले छोड़कर शहर चले जाते हैं। वर्तमान में जो बहू आती है वह अपने परिवार के रूप में केवल अपने पति और बच्चों को ही मानती है, वृद्धजनों को तो वह फूटी आंख नहीं देखना चाहती।
- वैचारिक भिन्नता : आधुनिक परिवेश में पला-बढ़ा बच्चा अपने बुजुर्गों की बातों को स्वीकार नहीं करता और उसे तुम नहीं जानते कहकर पल्ला झाड़ लेता है।
- एकाकीपन : वृद्ध नागरिकों को एकाकीपन के कारण मानसिक और शारीरिक अस्वस्थता का सामना करना पड़ता है।
- सामाजिक संवेदनहीनता : परिवार के लोग वृद्धजनों को महत्व नहीं देते। उन्हें सामाजिक संगठन के लोग भी बोझ समझने लगते हैं। वर्तमान के सामाजिक संगठन राजनीति के चश्मे से समाज का विकास चाहते हैं। उनके मन में सेवा भावना तो रह ही नहीं गई, इसलिए उनसे भी वृद्ध नागरिकों को कोई सहायता नहीं मिल पाती।
- सरकारी सहायता : सरकार के द्वारा वृद्धजनों को पेंशन, चावल आदि दिया जाता है, उसका भी वह उपयोग नहीं कर पाते। उनकी पेंशन और चावल को भी उनके शराबी-नशेड़ी बच्चे छीनकर ले जाते हैं।
वर्तमान समय में वृद्धजनों के संदर्भ में स्वयंसेवक संस्थाओं को जनजागरण करने की आवश्यकता है। सरकार को भी जनजागरण चलाना चाहिए ताकि वृद्ध नागरिकों को प्राथमिक सुविधा, दो समय का भोजन, चिकित्सा एवं सुरक्षा मिल सके। आज इस देश में शासन-प्रशासन द्वारा वृद्ध आश्रम चलाए जा रहे हैं। अनेक धार्मिक व आध्यात्मिक संस्थाएं भी वृद्ध आश्रम चलाती हैं। युवा वर्ग के लोग अपने माता-पिता को वृद्ध आश्रम में भेज देते हैं और फिर पलटकर नहीं देखते। युवा वर्ग से पुन: निवेदन है कि कम से कम जिन माता-पिता ने तुम्हें जन्म दिया है उन्हें प्राथमिक सुविधा तो देने की जिम्मेदारी उठाएं। अन्यथा याद रखें इसी प्रक्रिया से उन्हें भी आज नहीं तो कल गुजरना ही पड़ेगा।
-नारायण प्रसाद पाली
वरिष्ठ नागरिक साहित्यकार
गडरिया समाज छत्तीसगढ़
मो. 9575761235