मौन साधक वृक्ष है,
शिवत्व में सधा-तपा!
विष स्वयं स्वीकार्य करता,
सींचता अमृत सदा!!
वृक्ष वन उपवन सजाता,
जीव-जंतु श्वास पाते
कीट पक्षी डालियों पर
अपना शहर जहाँ बसाते
इसकी जड़ मिट्टी पकड़कर
रोकती हैं आपदा!
विष स्वयं स्वीकार्य करता,
सींचता अमृत सदा!
देता है फल फूल छाया,
ताजगी को शरण भी दे
प्राण-वायु दान करता,
बदले में जहर पी ले
वृक्ष के बिन मानवीय हस्ती
है एक प्रश्न सा!
विष स्वयं स्वीकार्य करता,
सींचता अमृत सदा!
संकटों के कठिनतम से
दौर में पर्यावरण
जंगलों की बलि चढ़ाकर,
हो रहा शहरीकरण
हिमखंडों के क्षरण में,
ध्वंस तांडव कर रहा!
विष स्वयं स्वीकार्य करता,
सींचता अमृत सदा!
वृक्ष छानता हवा को,
गैस धुआँ धूल सोखता
फेफड़े जिगर कलेजे की
बीमारियाँ रोकता
वृक्ष हितकर वृक्ष से ही,
हो भला हर-एक का!
विष स्वयं स्वीकार्य करता,
सींचता अमृत सदा!
शंभू का हो जलाभिषेक,
वृक्षों को पानी जो दो
हरित-कंठ है वृक्ष भी,
इसपे मनमानी न हो
वृक्ष से संतानों के
वंशों का हित होगा सदा!
विष स्वयं स्वीकार्य करता,
सींचता अमृत सदा!
मौन साधक वृक्ष है,
शिवत्व में सधा-तपा!
विष स्वयं स्वीकार्य करता,
सींचता अमृत सदा!
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985
मौन साधक वृक्ष है!
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