समाज को अब सिर्फ कार्यशालाओं की जरूरत है, मोबाइल व मल्टीमीडिया ने लोगों के प्रति अतिशीघ्र सब सुख भोगने की जो लिप्सा पैदा की है वह अति सोचनीय है। समाज में सब कुछ बच्चे चाहे हमारे हों या आपके, मोबाइल पर बढ़ता आत्मविश्वास और उससे ही मित्रता कहाँ लिए जा रहा है, अति विचारणीय है। हिंदी साहित्य और सनातन को कोई पढ़ने में समय नहीं देना चाहता है। नारी जाति का काफी अपमान अब हो रहा है, पहले तो वह ही विकास की धुरी थी। एक बच्चे द्वारा अपनी मां व पत्नी की हत्या क्या प्रदर्शित कर रहा है? आप भी सोचें। एक लड़की के बलात्कार वाले केस में तमाम गड़रिया नेता वहाँ गए और अपनी नेतागिरी चमकाने का जब यत्न पूरे प्रदेश भर से किया था तब भी मैंने विरोध ही किया था। इससे जिले की एकता को चुनौती मिलती है। जब कहीं ऐसे अन्याय होते हैं, समाज का खासकर पाल समाज का स्वास्थ्य खराब करने में आगरा मण्डल के धनगर गड़रियों का योगदान किसी भी जनपद से ज्यादा रहता है। झूठे मंच लगाकर समाज को गुमराह करने का खेल बरसों से चल रहा है। उत्तर प्रदेश में कई जिलों में पाल, बघेल, गड़रिया समाज ने पेरियार की जयंती मनाई, मुझे अच्छा नहीं लगा। कारण पेरियार को जितना सम्मान तमिलनाडु में मिल चुका है, वह और कहीं के मोहताज नहीं रहे। रही गड़रियों की बात, यह समाज अपना खोया वजूद पाए, आत्मसम्मान पाए, बड़ा सम्मान पाए, यही समाज का भी प्रश्न है और राजनीति का भी।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
परास्नातक जनसंचार
मो. 9794866822
समाज को अब सिर्फ कार्यशालाओं की जरूरत है!
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