(मधुगीति 260923 B) 23:53
क्यों बुद्धि इतनी लगाते,
हर बात पर तुम बोलते;
क्यों भाव-जड़ता में फँसे,
ना सृष्टि अपनी समझते!
तुम खोज करना चाहते,
अंतस को ना पहचानते;
ना सृष्ट के गुण देखते,
बोधि बिना भव झाँकते!
सद्भाव ना सम्मान ना,
संस्कार औ संस्कृति बिना;
हो शोध भाषा व्याकरण,
पर सुधो अंत: आचरण!
रहते सतह बिन बूझे सत,
गूढ़ता गरिमा से विरत;
करते सृजन क्यों ना महत,
उपयोग करके ज्ञान धृति!
पल-पल उछल हर दृश्य पे,
पाण्डित्य क्यों हो दिखाते;
‘मधु’ मधुरता ना भासते,
सृष्टा जगत ना चीन्हते!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
क्यों बुद्धि इतनी लगाते!
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