महिला सशक्तिकरण वह प्रक्रिया है जिसमें महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षिक रूप से सशक्त बनाया जाता है, ताकि वे अपने जीवन के फैसले खुद ले सकें, समान अधिकारों का उपयोग कर सकें और समाज में बराबरी का स्थान बना सकें। भारत देश में वैसे तो दिखावटी रूप से संविधान लागू है जिसमें सभी के लिए नियम-कानून समान हैं, लेकिन वास्तविकता में दुनिया का सबसे बड़ा झूठ यही है कि भारत में नियम-कानून सभी के लिए बराबर हैं। महिला सशक्तिकरण के लिए बनाए गए नियम-कानून सिर्फ और सिर्फ कुछ खास वर्ग और वर्ण की महिलाओं को सुरक्षा कवच प्रदान करने के लिए बनाए गए हैं, ना कि देश की सभी वर्ग और वर्ण की बच्चियों व महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाए गए हैं। सबसे ज्यादा सोचने वाली बात यह है कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर कुछ खास वर्ग और वर्ण की महिलाओं को यह सुरक्षा प्रदान करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? महिला सशक्तिकरण के कानून को बनाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि आज देश में महिलाएं भी किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं और जब आज यही महिलाएं अर्धनग्न होकर बाहर निकलती हैं तब कहीं कोई इस देश में गुलाम वर्ग और वर्ण का प्रभावशाली व्यक्ति उन्हें अपने प्रभाव में न ले सके, इसलिए महिला सशक्तिकरण का कानून बनाया गया है, ना कि सभी महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए। इस विशेष वर्ग और वर्ण को अशोक खरात जैसे बाबाओं द्वारा जब खास वर्ग और वर्ण की महिलाओं का वीडियो बनाकर, वीर्यदान के नाम पर शोषण होता है तब इन्हें कोई ज्यादा खास आपत्ति नहीं होती है। लेकिन गुलाम वर्ग और वर्ण के प्रभावशाली व्यक्ति के प्रभाव में यदि कोई नैतिकता के साथ भी इन संबंधों को आगे बढ़ाता है तो महिला सशक्तिकरण के काले कानूनों का दुरुपयोग करके उस गुलाम वर्ण और वर्ग के व्यक्ति की जिंदगी कैसे तबाह की जा सके, इसलिए महिला सशक्तिकरण के कानून बनाए गए हैं। अभी उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में शिल्पी कुशवाहा की हत्या एक ब्राह्मण परिवार के युवक ने फावड़े से घर में घुसकर कर दी, लेकिन यहां पर योगी बाबा के बुलडोजर का डीजल खत्म हो गया। एक साल पहले उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में धन्नू तिवारी ने एक नाबालिग बच्ची के साथ दुराचार किया, तब योगी बाबा के बुलडोजर में तकनीकी खराबी आ गई और वहां पर महिला सशक्तिकरण का कोई कानून लागू नहीं हो पाया। कौशांबी मामले में तो प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने खुलकर आरोपी परिवार का समर्थन भी किया। इसके बाद बच्ची के परिवार वालों को जेल में भी डलवा दिया। लेकिन पीड़ित बच्ची की जाति के सांसद जो सुरक्षित सीट से सांसद हैं और कहने के लिए केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं, वो पीड़ित बच्ची के घर सांत्वना देने तक भी नहीं जा पाए। क्या हमें ऐसे नेताओं के ऊपर गर्व करना चाहिए या शर्मिंदा होना चाहिए, ये फैसला हमें खुद लेना पड़ेगा। अभी कुछ दिन पहले फिर कौशांबी जिले में एक बच्ची की हत्या करके उसे पेड़ पर लटका दिए जाने का समाचार मिला, लेकिन यहां भी महिला सशक्तिकरण का कोई कानून काम नहीं आया और यहां भी योगी बाबा के बुलडोजर की हवा निकल गई, क्योंकि पीड़ित बच्ची एक विशेष वर्ग और वर्ण से नहीं आती थी। जीवन एक अनमोल उपहार है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन जितना महत्वपूर्ण है, मृत्यु भी उतनी ही महत्वपूर्ण है? सवाल यह नहीं है कि हम कब मरेंगे, सवाल यह है कि हम कैसे मरेंगे? क्या हम पीड़ा, अपमान और बेबसी में तड़प-तड़पकर मरेंगे या मान-सम्मान के साथ, गरिमा के साथ, अपनी इच्छा और सम्मान को बनाए रखते हुए मरेंगे?
-उदय पाल, दिल्ली
मो. 9821189131
महिला सशक्तिकरण कानून को बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
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