लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक पार्टियों के लोग जब-जब निर्वाचन का समय आता है समाज के शुभचिंतक बनकर बरसाती मेंढकों की तरह बाहर आ जाते हैं और तरह-तरह से समाज को लाभान्वित करने का अपना राग अलापने लगते हैं। समाज में कुछ जागरूक लोगों को छोड़कर बाकी समाज के पदाधिकारी जिन्हें कुछ छोटा-मोटा पद दे दिया जाता है, वह पूरे समाज को अपनी सामाजिक पद प्रतिष्ठा की आड़ में राजनीतिक पार्टियों को वोट बैंक समझकर परोसने का काम करते हैं। आज यह प्रवृत्ति सभी राजनीतिक पार्टियों में पूरे दमखम के साथ आ गई है। राजनीतिक दलों के द्वारा डोर-टू-डोर ना जाकर समाज के प्रतिनिधियों को अपने वादों से, अपने प्रलोभन से, अपने पद प्रभाव से अथवा पद देकर अपने नियंत्रण में लेकर समाज को ही अपना वोट बैंक बनाने का कार्य करने में जुटे रहते हैं। आने वाले समय में विभिन्न निर्वाचन हैं, इसलिए उन्होंने अपने एजेंडा अनुसार प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न समाजों के पदाधिकारियों के साथ जनसंपर्क करना, ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक भवन के लिए, प्रतिमा स्थापना के लिए व विभिन्न कार्यों के लिए छोटी-छोटी घोषणा करना अथवा बड़े प्रभावकारी नेता से काम देने का आश्वासन देना सामान्य बात हो गई है। अत: आप चाहे किसी भी जाति समाज संप्रदाय या वर्ग से आते हैं, आप अपने समाज के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की सुविधा, छात्रावास की सुविधा, आरक्षण की सुविधा, कला, संस्कृति, साहित्य, अपने समाज के महापुरुषों की यश कीर्ति की गाथा के लिए प्रयास करें। अपने समाज के बच्चों को कलेक्टर, कमिश्नर, निर्वाचन अधिकारी, मुख्य कार्यपालन अधिकारी, तहसीलदार, दंडाधिकारी जैसे प्रशासनिक पदों पर पहुंचाने के लिए विशेष काम करें। राजनीतिक दलों की कठपुतली बनने से बचकर रहें। -नारायण प्रसाद पाली
राजनीतिक दलों की कठपुतली बनने से बचकर रहें!
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