आजकल समाज के नाम पर नए-नए संगठन बन रहे हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन सवाल है—जमीनी हकीकत क्या है? अगर समाज के कुछ लोग राजनीतिक दलों में बड़े पदों पर हैं, तो बताइए—कितने समाज के योग्य लोगों को टिकट दिलाया? कितनों को राज्यसभा या विधान परिषद में प्रतिनिधित्व दिलाने की आवाज उठाई? या फिर समाज का नाम सिर्फ अपनी राजनीतिक हैसियत और निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? जो संगठन समाज की एकता का दावा करते हैं, उनसे सीधा सवाल है—क्या सभी संगठन समाजहित के मुद्दों पर एक मंच पर आ सकते हैं? अगर नहीं, तो फिर एकता के दावे किसलिए? समाज आज अन्याय और अत्याचार के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठा रहा है। अब समाज को भाषण नहीं, जमीन पर संघर्ष और परिणाम चाहिए। समाज के नाम पर राजनीति करने वालों से आग्रह है—भोली-भाली जनता को गुमराह मत करो। अगर समाजहित में साथ नहीं चल सकते, तो समाज के नाम पर अपना धनुष-बाण रख दो। अब समाज पद नहीं, काम का हिसाब मांगेगा।
-नेमसिंह बघेल, वड़ोदरा
भारतीय रेल सेवानिवृत्त
व पूर्व ट्रेड यूनियन लीडर
मो. 9427343302
सामाजिक संगठनों की जमीनी हकीकत क्या है?
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