(मधुगीति 260912 C) 22:15
कितनी कला मानव किए,
हर प्राण से उलझा किए;
जाने न हरि देखा किए,
हर रूप रंग रस वे रहे!
उनके हरेक विचार में,
संस्कार और विकार में;
उपचार और प्रचार में,
पाण्डित्य और प्रहार में!
चित के हैं चपल प्रवाह वे,
हैं अहं के वे ज्वार हर;
वे महत की हर हैं महर,
आकाश भू हैं उनके सुर!
जो भी किए कुछ जगत में,
पाये खोये हैं प्रवास में;
सब कुछ रहा प्रभु गोद में,
हम रहे उनके स्वप्न में!
हर भाव औ भव भंगिमा,
सुषुम्ना की सुषमा सुधा;
‘मधु’ के प्रभु की है विधा,
हर त्राण तृण गण वे रहे!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
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